7 भग वा 9२9१) र) ८} 06४) (1 95 1 ( 411 ५ & (0) श्न ॥ ~> 1 + 1 ट 4 ४ घ्य ६ [ ई {नु ॥ जिर । र \ |. | जसे - ध -मौनिचासौ सरदार कवि नै श्चैसन्यहा- क 1. ^. ^~ ॥ ध्वाचिराज खर्मवासौ सहाराज ईष्ठरी- & ादनारावगसतंह वद्यडुर ७.५.४.1. ¢ ॥ र{सकृष्णवस्छ व 3. काक्षी / & गवन वन्तालयःसे प्रकाण स्िवा। ध र खन्‌ १८९५ इ ० । 1 २ ` | 3); 62505269 प ८ मूल 14 सीकष्णा स || प्रानसरह स्ख एक दिवस श्रीमहाराजमरिमुक्तुट काशौ- पर.रिस कौ समा सें अनेकं कवि कोविद्‌ कै सा- ववुहे यद चर्चा होत रहौ किदेखो वेट्‌ ने तीन को निष्पन कीनो । कार्म, ज्ञान, सक्ति) तासे , क्रो करौ ज्ञानसाधन भक्तिनिसित्त ड। अस काह कहौ की नारीं भक्तिसाधन ज्ञाननिसित्त हे । तव कोद्धै उत्तरकाण्ड श्रीगोसंदणो को कियो ताकौ एकत चौपाई पट्‌ उठे कि-- '"ज्ञानदि सक्तिहि नहि कषु धैदा । उभय दरे भव 'सस्पव खेदा 1: सो सुनि प्रौरायक्नपापाच सरी गालपालनं सचकुलसालन दारिद्रवालन महाराज ने धन्ना दई कि यह जो राम्रचरित- सनस गुसांडजौ ने कौनो श्रुति सन्यत सहित सवते अविरोधी रामभक्ति द्दृ करन इईतु डे श सानसरहस्य । काहे थाको सङ्गल वस्त निर्दे ड । ““नानापुरा- गनिगमागससच्पतं यद्रासाये निगदितं कवि- दन्यतोऽपि ।” तो अन्व ते संहिता काव्वभाव ताकोन जानङक्षेजे रासायनसें प्रवेस्त करत इहै ते वड़े पशिडित है । धाते एक तिलक याको एसो वनै कि जासे श्रुतिसम्यत बनो रै । अशु कवि सप्प्रदाय से विरोघनषोय अर्‌ छैपकमभ्ये जानो जाय जीनो पद्‌ कठोर ड तिनको व्याश्या | भी होय अस मानस वश्व कवित गुन नाती | सो ता निसित्त सर्वं अङ्ग काव्ये मी ष्ौटिं | जेसे बाल से--“नयन चसौदटग वरिभच्चन । | नाम रूप दद्‌ ईस उपाधी ॥ धिग धर्मध्वज घं | धक घोरी । गीतमतियगति सुरति करौ ॥" | इत्यादि--सातकाण्ड कै तिनकी व्याख्या । ची | जो बड़ महाराज रामचरितसानपर्यस्िक ने बड तला ते बहत परिडिति कविनकषे सस्तते पोधी शच्च कराई ताको पाठ रहै । ची गोसाई क्षे ग्रन्थवानते उदाहरन । जाते सन कोड काव्य -------~ ` मानसरहस्य । २ जान रासायन को अर्धं जानें ससव को खार्घं होय एेसो तिलक वनि जाय ताते काव्यरीत लिखियतु द । प्रथ काव्यलत्तप रस रणष्टस्य ~ टोद्धा । जग ते अद्भुत सुखसदन सब्द्‌ स अर्थं कवित्त। जग ते अद्भुत सुख लोकोक्ति चमत्कार ॥ दोदहा। सरल कवित कौ रतिचिसल सो आदरदिं सुजान, सहज वेर विसराय रिपु जो सुनि करडि वखान्‌॥ काव्य प्रयोजन) जस सस्यति च्रानन्ट अति दुरित न डारे खोड । होड कावित्त ते चातुरौ जगत सास वस होड ॥ जस) सुनिन्ह प्रथस इरि कीरति यई । निसमल जसहि अनुदर सु वानी ॥ यांत ~ सम्प्रति । -चाडि चाहि आरतहरन सरन सुखद रघुगेर । श्रानन्द । भयो दय चानन्द उच्छाद्भ । - ~~----------- ~~~ ----~----- ------~---- ¢ सानसर्दस्य। सज नाम) निजगिरापावनकरनकारनरामजसतुलसौकद्चो।. ` ्ातुरो । रोभोउ तोरि देखि चतुराई । वसोकरन.। विनय प्रेमवस भू वानी । इत्यादि जानि लीजे-- श्रृ कव्य | चत्त को कारन--शक्ति, व्युत्पत्ति, च्रभ्यास | होति ह व्युत्यत्ति काव्य जानने ते । अभ्यास जो काव्य जाननहार कौ सिच्छावा करने ते षहोय। शक्ति यथा! । जापर क्षपा सरदि जनं जानौ । कवि उर अजिर नचावदहि बानी ॥ व्युत्पत्ति धनि यवशेख कवित शुन जातौ । श्रभ्य्रास्। + भलित मोर सव गुनशर्हित । ~ --~-----------------~_--~---------------_-~--=-~ ~ ---~ लन्तणए । । श्रक्तिजो दहे विसल प्राचीन संस्कार जन्यः सानसरद्सख । ५ | से तीन रौत कौी--उत्तस, सध्यम, अधम । लसच्ण। जीर सरस पुन देह सम देडै बल जेहि टीर। उत्तम मे विङ्ग अधिक, सध्यस में विक्ग वाच्य वरावर, रधम सें वाच्यार्थं साच। उन्तम यधा) सदहसनास सुनि भनित सुनि तुलसी वह्नस नाम। सकुचितदहियदहंसिनिरखिसियधरसधुरन्धरराम ॥ यहां जानकी तुलसी के वल्लभ सुनि हसौ राम संक्षाच ते उपपति विङ्क। अधष्यम) जाना समरस नहात प्रयागा। प्रयाग नहात सद्भ्य सै जाने ॥ मरत नाम ते प्रेम अधिकाई। सो वाच्यकी वरावर ₹है। अधम । जामे विङ्ग नाहीसे दहे रौत कौ--शब्दचिच्, अरथचिच । । शब्दचिन्न यथा । अमिन अर॑वक चरंब उमग सुच्रंग पलकावलि छड। ह सानस्र्द्स्य । यद्ां अनुप्रास कमे चसत्कार 8 । पर्थचिच्र यथा । नसासिं सक्तवत्छलं-- यासे रधं चसल्नुत ३ । । शब्दां निर्णय ॥ जा सुनिये से शब्द्‌ ह अधंजु समु चित्त । सा शब्द्‌ दा रौत कै--घुन्वात्मक, वर्णा- त्क । धुन्यात्क जे बाजा ते निकसे, वर्णत्यकां तौन रीतक्षा। रोद्धा) वाचक ल्क विङ्ग क शब्द्‌ तीन निधि साय । वाच्य ल्त रस विङ्ग पुनि अर्थं तीन विधि हाय॥ वाचक सलच्तसं। वाचकं जै ससहाय बिनु चाप चर्धं कडि देय। नाच्य अर्थं पद्‌ सुनतद्टो जाहि चित्त महि सेय। अधा । जल संक्षच विकल मद मौना । जल सुनत पानीके ज्ञान मये याहौसों वाच्यां कषत हं । जासेा लखिये यह अरथ सानसरहस्य 1 ७ अभिधा से व्यवहार। यारी सीं शक्ति कहत हें । दोद्धा 1 या प्रद ते एद्‌ चरथ जाना एेसा रूप । जे इच्छा भगवान कौ से ह शक्ति अनुप ॥ यह रविधा क तत्व लन कच्ची, चरस वा- चवा कै चार भेद ॥ काव्यनिणेय दोदा। जाति जदच्छा गुन क्रिया नामसु चार प्रकार। जाति यथा । देवदनुज भूपति भट नाना । देव मै देवत्वजाति, दनुज मे दनुजत्वजाति। लटन) यथां) भद्या कह कुशल देउ वारे । शुन यथा। स्यामल गौर धरे धनु भाथा । । क्षिथा यथा) भये बहरि सिसु रूप खरारौ । ल्ठक । मुख्य रथं का वाघ जरं शन्द्‌ लाक्चनिकं हाय । ८ सानमरहस्य । यथा 1 सड सुनौस सहासट सानी । स्द्छन7तनचतम ) मुख्य अर्धं कै बाध तें एुनि ताह कै पास । रीर अथं जाते बने कड लच्ना तास ॥ लच्नावौीज, तातपर्यानुपपत्तौ, चअन्वधनुप- पत्ती, तथापि तातपजं न मिले यह मानत, से दा रीत का! एक निषूदौ एकं प्रयोजनवती, जामे घ्वनि नादी सा निरूटी, चस जामे ध्वनि हाय से प्रयोजनवती! निरूटी वधा । नभाव राउर सादर सा । कुशल हेतु सो भयो गुसाई ॥ इर्य कुशलवारे को कुशल कहो चाष्टौ सो अनन्द चरथं कीनो | प्रयोजनवती । “लिये चोर चित्‌ राम वटोरहौ?* तो चित धन नारीं जाको चोरी होहि याते मुख्यां नाध करि अपन अ्रासक्तता सृचित करौ प्रयोजन यह सानस्रहस्य) € „~ .---~~--------- ~ -----~ ------- चति सुन्दर ड । चौर प्रयोजनवतौ कै दे मेद्‌ प्रधम उपादान ताको लक्षन काव्यनिनय-- “उपादान सो लच्ना परगुन लीने होड” यथा ‹“तच चले बान कराल" तो वान चआपरते नाहीं चलत पुरुष चलावनहार को गुन सौनो । सक्तितरच्नाख्चन “निन ललन चौरहि दिथे लक्ञलक्षना जोग? । यथा--“वौच वास करि जसुनहि आधे? । तो जमुना से चादवो असम्यव ह याते तीर से आये यह लक्षना जमुना शब्द ते आपनो सीतल पा- वन गुन तरनी दयो अरु हैदै सेद शु्ागौ- नीके सारोपा, साध्यवसाना, ताके लच्तन । जहां जाको आरोप कौजे अस जामे आरोप बीजै सो दोई पद्‌ पाद्ये सो सारोपा । रौर जामे मसेप कौजे सोद पद पाद्ये सो साध्य- वसाना ¦ तामे दै मेद । गौनौ, ` सुद्धा । जहां बरा बसौ को सम्बन्ध हसो गीनी, चीर. नहां च्रीर सम्बस होय वाचकसो कै कारज सो सृद्ठा। (4 सानसर्‌हस्य । गोनो सारोपा यथा| “धविघु-बद्नौ खगसावक लोचनि' । तो इदा विधु खग शब्द्‌ विधु खग से हे परन्तु ्रपने गु- नन कौ प्रतोत सुख लोचन से करावत दहै । सुदाखारोपा ण्घा। ` रघुवंसिन कर सहज सुभा । । समन दुपन्ध पग धरे न काञ ॥ इष स्घकोजो कीनो घसं ताको पालनो यह सस्बस् ते सुद्धा । धरम को ्रारोपन वंसिन मेसोदोदरपाएयातेसारोपा। गौनोखाध्यवषानां यथा । ९. “सुकर मलिन चस नयन विहीना? । इद, शास्त को आरोप मुकुर मै अधवा कमंकोसौो कर्मन पायो असन्ञान को आरोप नयन मे सोज्ञानमी न पायो वाते साध्यवसाना । री नेच न्नान नरावरयी ते गनी) श्रध सुद्धासाध्यवसाना । 1 भि (मायावस परदन्न जड़ जौव कि ईस समानः ~~~ सानसरइस्य। ९९ तो इद ससार को आसेपमायामेसो माया साच पाई, असु साया ईष्वरकी दै या सस्वस ते णुद्वा, असं लन्तना क सेद सव ८्णहोत ह सो ग्रन्य्चद्धि कषे मयते नदौ लिखि टोद्धा ` प्रघस सेद सु्हौ गौनी सुधि के चार । ` एसी विधि जानिये टै ल्छना प्रकार ॥ च्म विंत्नना। ; शर्धं वनाय कदे अधिक विंजक किये सोड्‌ । ॥ “॥ ॥ ॥ 1 ॥ णब्द्‌ सुने समुमौ अरघ होहिजु विमल विकास। सोई विंग जु लक्नना अविधासृल विलास ॥ लच्लना सृल विंग मे लना को फाल विंग जानिये । चभिधामूल विंगमें चौर अर्धनं की प्रतौति सो विंग जानिए । विंगहि कड सुव्यंजना ल्य सवहि मृख देय । सो विंगदो सौति कौ । लचनाम्‌ल। अविधा मल । सो लन्तनामन्न टो रीतिकौ। गट. यगट तएक( लच्न्‌ | १२ , मानसरहस्य । कवि सुहृदय जाको लख विंग सुकदिये गृट्‌ जाक सव कैल लखे से एुति हाय अगु ॥ ध गडविंग वधा। विप्रव॑स कौ चस प्रसुताद। अभय हहं जे तुष्हे डर ॥ इह हस च्रापक नाहीं उरात चाप कष | ब्राह्मगत्व कों रात यह लक्तित लच्न तै तुह ` | ते दाषमागौ यह विम । गुट यथा 1५६ «साता पितहि चरित सए गौर । दहा मावादरूरी विंगसोप्रगटडीदे। अतरिधामूल लच्तन । वहत चरथं कै शब्द्‌ के जेागादिक चनुजुल । अर्थं नियम तदहं कीजिये विंग सु अविधामृल ॥ कहू संयोग वियोग कहु कद्र कहे पुनि संग। ` कद" विराध कर अरं कहं प्रगटत विंग प्रसंग चीर शब्द कै साथ पुनि चिन्ह समै अरु देश । ए जौरे पुनि जानिए शक्ति विंगकै मेस ॥ ,. ६६ ~ सानसरदस्य। १२ रयोग यथा । साल तिलक ग्रमिन्द्‌ साए 1. ङ्ह तिलक मे संयोग ते साल लिलाट जानिए, सहचरे थथा। रामवियैग कहा सुनि सीता } <= दासरधी लिए । सद्टचारो यद्रा रास लश्ठन सिय कानन वसद । ड शमी दासरथौ लण्बन सष्चासै ते 1... चिरोध यथा| घर वार मुनि विप्रवर कहा राम्‌ सन राम. ॥ ङ्ह दासस्थौ परसधर जानिर याही रीति ते जान जान लौजै। चर्थलु तीन प्रकारक व्यंग सवन ते हात) वाच व्यजकता यथा। तो ए६ द पद्म पखारन कषु द्रा पट्पषार तनादिक कार्म कति चाष्टत से बाच्यते जानौ जात पिदढतारन वंग । ९४ मानसरहस्य । स्न्नक्र विंजकता वथा । धर्मलीलता त॒ जग जानौ । इष्टा विपरीत लच्ना करि त्‌ धमी हे । „ज ˆ व्यंग व्यंजकता यथा| बन्दा राम नास रघुवरकषा । | उतु छसानु भावु हिमकरका॥ | इ क्षसानु सालु खिसकर शब्द्‌ ते न्रह्मा ¦ विषा, म्स प्रथम व्यगताते उद्यति पालन सं- | हारकार्ता, दितीय व्यंग । चव केवल च्थ॑रीते, व्यंजक हात रसे कहत हे। | ~~ ------ -------------~----------- ~ = -~* । लत्न } | | व्य॑जक शब्द्‌ सहाय ते घर्थ॑जु व्वञ्चक डाय। | कदं कदं तिहि दीर में प्रगट मना सोय॥ | वक्ता बरन सकाकु पुनि वचन अथे संग | ॑ समा ूप.टिग चीर कष प्रगटत व्यज् प्रसंग ॥ | देस ससय सिलिक्षे कीं नौ विधिम कविसान। व्यंग्य हात वड र्ध तें लखत सवद्धि समाज ॥ . वक्ता वसिष्ट यथा! „कत सिख देड इसे कोड भाई । = “ “---* ~... सानसरहदय } ९ म ङ्ह वक्ता संथरसा के वचन सं व्यङ् ड! रजिनासकारनक्षया छपावत । चोद्ध यश्रा। पुनि चाचव यदि तिरिवा कालो । ` इदा कडा जानकी परै व्यङ्ग । सकु । सस ननुज कसरे सह वंमा! काराससनुजदं चरन्य सनिध। ९ रौभार्हिं राजक्रग्ररिवि देखी । “`. ~ दूह अपुस सं कडि नारद्‌ का सुनावत। वाच्य! कुप्य सां रज व्याकुल शग देड सनहु स॒निजेमौ ए क यथा। ~ उद्य अशन चवक ताता । इड प्रात सूचित । काद्‌ काहू चेष्टाते मी कहत । = (८3, यथा) ^ खंजन स॑जुल तिर्षे नयना इत्यादि .' £ सानसरहष्य। श्रथ ध्वनिक लच्तन। मल ल्तना हे जहा गट व्यंग परघान्‌ साज ध्वनि दामांतिकौ कदत सक्त कषिराज। अविविच्छितद्क दूसरो कहत वित्रिच्छित साज श्रविविच्िति ल्तगा काञनिखय। तए को इच्छा नहीं वचनडिकोाल्ु प्रमाव। व्यंग्य कड तेहिनाच्य को चवितिच्छित ठडराव ॥ यधा । ~“ षकं म सेवक वारहिवारा' । इहते १्यृब सेवकगन गरह गलानो' । इहा लो, षक्ता भस्तवाच्य बैचान हम चलिडैसो ल- चन लन्तना तै जानो जात, सेवक छासि. माव ` व्यंग ते.सेवकन्‌ चो स्लानि भद्रै वह व्यंग | ४ विविज्छित लक्तण | ८ जय वक्ता कौ इच्छासे विंगक्टैसोनि- बिल्लित । 4 यथय । “वरि गौरि कर ध्यान करद । भूप किशोर दि किन लेद्ध ॥ | लानरूर हस्य । १७ तामे दो सेद । यर्धान्तरत्॑क्रसितवाच्चध्वनि, । चल्यन्त तिरस््तवाच्यष्वनि । ताको लच्चनं ॥ चधं ओर सो सिलि रहै सो च्र्घान्तरसंक्रसित। चअस जद व्यंगं कौ चधिकाई कदि को वाचक शपनौ अर्थं दोडि देव सो अल्यन्तं तिर- स्तवाच्य ष्वनि। ? पर्थीन्तरसक्रमित यच्रा। [ जनु जुग नामक प्रजाप्रान से! यामेएकं प्रजाप्रान भरतक्ते पार्‌ दूज सिट रकार मकार प्रत्यंततिरसछत यथा) "कुन्टकली द्‌ाड़मि दासिनौ' । इहते, गज | | केहरि निल करत प्रसंसा । उदा तक । हरषे पाद्र सकल जनु राज्‌ ।' तोडी हरषद्वो असम्बव तव वाचक ले अपनो अर्थंद्छोडो अस साध्वावसाना ते द्सनादि लौनो की उपमेय ते|| उपसान नाद्र पावत रहे प्रह गृटु ग्यंग अस | तिहार नैरिन को रष हस ते नाद्यं सहो जात , यद्र ध्वनि । अम्‌ ज ध्वनि जद कत तै यह ~---~ .----~~~--~-~-+--------- -----~-- ----------- ..------~--~---~-~-~-*--- „~~~ १८ भानयमरष््य । लिखत कौ जव व्यंग मे अधिक चमत्कार होय सो.ध्वनि। याको कष सेद बद्धक म सा- दिव्य सरसी मे लिंख्यो इईैः। . दोहा । अर्थ व्यंय के कामको नं सो.षच्वनि दहै सौति प्रयमहि क्रम नहि नानिये दनो क्रम वँति। जदह करस नहौ जानिये सो च्रसंलच्चं क्रम व्यंग ध्वनि काव । अर्‌ जही क्रम जानिये सो संलचं त्रास व्यंग ध्वनि कश्ावै। दोडा। जदि क्रस नहि जानिये सो ध्वनि बहत प्रकास नव रसभाव अनेक विधि पुनि तिनक्षे जआभास। सान्ति सन्धि थक्‌ सवलता उदयभाव विधि चोर। तद्य विराजत नास ए ए प्रमु जेहि टर ॥ अलद्धार ए होत सव जरह चौर परधान । वाक्त 1. ` । छ रस चंग होय मुख्य रसभावादि्क् शोय , तद रसवदटा अलंकार काहे रस न किये. । सानसरुडखख । १६ [ " ता जला भाव अंग होय मुख्य कोऊ चोर होय तद प्रेयसत अलंक्तार । नहा चासा ्चंमदोयसुश्य को चौर होय तह अजस अलंकार । ल्ह | भाव सान्ताददिक चंग रोय तदा संमाट्ति। इनं क उदाहरन स्स काव्यक्षै प्रसंग भे करगे । | च्रवरस वको द्पर कदियतुडहे। तद्रस को मल भाष इ याते प्रथम साव कह्ठिवतु ३ । ॥ धाव लन्नेण। रस अतुकुल विकार को भाव कहत कविंसंजं। यथा) कङ्नविङिनिनुपुरघुनि सुनि । < कदत लखन सन रास दय. गुनि ॥ इहा धुनि सुनि क्र अनुकल विकार उ- पलो । सो साव चार प्रकारं को { विव, घ- तुभाव, संचारी, थाई । विभाव .लन्तणः। जिनते जिंनक्षे जगत मै प्रगटत ड धिर भाव। तेद नित्य वात्रित्त से पावत नास विभाव ॥ २९ मानसर्टस्यं । ५ ` श्मनुभाव सन्तण। ` धिरभाव्नको ओरकोप्रगटे ते अनुभाव । संचारो ञे साधो वहत वटवे हाव ॥ यसं सवरसमें संचरे ते विभावदो भौति। ्रालस्वन, उद्ौपन । लन्षण। जे निवास धिरभावरकषे ते आलम्बन जान । सुधि भ्रावत जिनके लखे ते उदीप वखान ॥ च्रालभ्बन रति की कहत नवल नारि य कंन्त। उद्यीपन वंह अतिक घन वन सरद बसन्त ॥. ्रालस्वने यंधा। ^. अस कहि फिर चितये तेहि योरा! सिवमुख ससि भए नयन चकोरा ॥ प उरीपन यधा] <.प्राची दिसि ससि उये सुहवा । सियमुख सरद देखि सुख पावा ॥ जानकी कोयादीरोत। टेखि सूप लोचन क्षलचानैः प्रानस्नन॥- ` _ “निसहि ससिहि निन्दटहि वह भीती । ० ~न मानसरइखख | ९ षटोपन। सोभरीदोरीतके। घनवनसरदादि देयौ, खषवस्वादि सातुपौ । पट उर साय सोच यति कौन्हा।' ्रनुभाषव) वचनं चितयो वक्रा विधिम जे साल्िकभाव। च्रालिंगन चुन्नन जितै ते काण चतुभाव॥ यपचन्‌ ववा सानह मदन दुन्दसौ दौनौ। . चितवन यथा| प्रसुहि चिते पुनि चिते सहि राजत सो चनो खेलत सनसिज् सीनज्ञुग जनु विघुमण्डलडोल सखाखिक्र नच्तन। वधि रह्िवो खरभंग पुनि कंग खेद च्रमुच्रान ! रोम विवनस् चंत पुनि सालक भाव वखान्‌॥ यथा) 'सधिक सनद टेहसई भोरी' इयादि जानिए (- शव संचासो। प्रथम कहत निर्वद गल्लान । स्का अम्या मद्‌ ग्रम जान ॥ २९ सानस्तरषस्य । पालम व्रि दनतय चित्ता । सोह श्रसित छ्ति लाज कहन्ता ॥ वेग चलता जडता हषं । गभं विषादृर नद्‌ असर्णं ॥ श्रौत्‌सुक्छ चप्सपरार सोदवो । पोच उग्रता प्रान खोद्धवो ॥ सचि व्याधि चरवदित्या चस | उन्द्ाद वाद्‌ पुति तक विलास ॥ संचार तेतौस गनाए । नवद रस कै संग सुहाए ॥ संचारी लन्तण। | जहि तहि निधि संसार सुष्ड देखत उपल खट्‌ । उदासौनता जगतत सो काधि नवद्‌ ॥ राधि व्याधिते नजो मड वलकौ हानि ग्लान । बत्तु भावती हान ते उर पुनि संकासान ॥ अनसहिवो पर सले को सुवह असूया देय. । सोहल शति अानन॑द्‌ तै सद्‌ कियत है सोय॥ बहत उतावल क्राः ते मजु सियित्नता यंग । उटि न सक एेडाय तन जहां सु आलप चंग ९ ---~~~-----“~~-----~-~---------~-- मानक्षरहख | । २९ होय.सलिनस्नन दुखन ते तव दरौनता काद्‌ । चिन्ता जो प्रियक्छ कौ ध्यानो करत विहाद्॥ चित्तविक्रलता सोह इ स्मुति सुधि कर होय । | धति संतोघ वखानिये लाज सक्ुचिवो सोय ॥ अनहोनौ को होत लखि चितस्स सो च्रावैग। चाज उताडल चलता जष्टं सन ई उद्षेम ॥ सव कामन ते सृच्रद्धे रहिवो जडता सौद । चित से चतिच्रा्नँद्‌ उसि कटो्र्ष तव होद्ध ॥ सव ते सवविधि हो सर्त यद चितभर्म काय | दुष ते सन चतिद घटे यह विषाद्‌ को भाय॥ जरं दद्कु काम न कर सवींद्द्रौ निद्रा होय परर सो कषये जद क्रोध अधिक धिर नोयं॥ ह| सोत्‌सृच्च जरंकास कौ चितन सदिसे ठौल। चपस््ार जरं सूरः समर विकलता डौल ॥ सपनो किये सोदधवो बोध जागिवो हदर्‌ । जग निंटन समरत्य चित करै उग्रता सोड़ ॥ प्रान मगनता सरन मति निहवचे न्नान्‌ काय । होद्रज मनसताप ते तन गद्‌ व्याधि सुभाय। छन ~~~ ~~~ ~ ~~~ ------~-~--- ५ ~ न्य सानसरहश्य। अवर्त्या जरं लाजते पन सोक लखाय। चित खम सो उन्द्राद डर पुनि चास कहाव॥ सोद तवी वादानिवे जरह विचार वह साय । संचाथे तैतीस ए कर सकल कवि गाय ॥ ध्रु सभाप्रङाग। साग गति चात्ति रूप मोर्‌ चंग करे परनि धारौ से टट प्रगटत निस्धाच्चौ है । निवेदं अपस्मार समरन कहत कषाई संतरका अगस सिंगार चै निवाश्ठी ₹े। कौम्युम म्र गोश खनं क्षा तामे ते संचार निकाखौ हे॥ भावगति ३ । दुका अथं रति कौ गति व्ण चलाय देय कोप प्रगट हाय मावर रति उ- व्छादादिता कौ गति को चलाय देय सानादि अंगीकार वरे चौथी तुक का अर्थ निर्वेद सप- सप्रार मरन ये तीन संचारी करुना वौभत्सादि सें दधात हे। असुच्रानग्रन्यते तीस गृह्णारकै हातदहेसा हम साद्ल्यसुधाकरकै मंगल मं लिङ डे, | | न ~~ *~------~-*"------ ~ ---------~------~ न ~~ ~~~ एक श्रित भप लानसर्हद्य । च्व संचारी &§ द्दाहरण निदेद्‌ यथा) र चद प्रसु क्षपा करह इहि भाती “~ । सव तजि सजन करैं दिन राती ॥ श्ला{न यधा) ऋस कडि वचन सचिवै रहि गएस । ष्ानिरतानि संका यथा। शिवहि विक्लाकिस्संक्षेड सार! ` चस्या या) तव सिय देखि मप चसिलाषे . -। कर कपत सट मन साख ॥ [द > © । सद । रनसदसत्त निसाचसर दर्पण . । श्रम । । निद्रा ति आड "यारी मे निट्राः। परख) रघुवर जाय यन तव कौगिन्हा । दीनता । पाहि नाध कहि पाहि गासाई | चिन्ता। चितवत चक्रित-चहदिसि सीता मोद । लौन्हि लाय उर जनक जानौ । ^ <= <^ ४) 4 मानसरहस्य | सुमिरन । जव जवं रास चवध सुधि करौं । ति । „ “सुनु मातु सँ पायो सकल जग राज थज्लु . न संशयं 1” । खाज! गु जन लाज समाज बड देखि सीय सक्घुचानि ५ भवेग) । ~ लछमन दौख उसा छत वैषा । चकित । प्पखता 1 . करत मनोरथ चातुर्‌ धावा । अता) ` मुनि सन सफ चचलद्धौ वैसा । परम्‌ । रणि राम भै टेड हतुमाना । ग्भ( कदं जगमो ससानकोयोधा | दिषाद। अति विषाद बस लोगलुगादे । ` श्रमर्षं। जीतेजोमटसंयुगमदहीं . । सुनु तापस मै तिन सम नदौ । } | सानंसरषसय । २७ [क प्द्ल जैत । श्वा । रस कहि सषि परसो महिरास् । भस्नृस । रास लखन सखि होहि कि नादं खपु सपने वानर लंका जारी । वोघ। प्रात पुनीत साल प्रभु जागी | उ्रता। जिते सुरासुर तव श्रम नाहीं लर्‌ वानर कैहि लेखे सादौ | | ॥ सूर््छ ] रा यस कहि साम कडि राय राम कहिरास। | तन लयागो० | पनाम | सयो ज्ञान उपलो नवनेहा । व्याधि । 0 यह कुरोग करर ग्रीषधि नाहीं । श्रवदि ट्या 1-\.-८ चकित्‌ चितव सु द्रौ पटिचानौ । ~~~ ----- २८ सानसरहदस्य । उन्प्राद्‌ । „काव कि पनि पटे फिरि जाई । पनास । गुर पहं चलते निस बड जानौ ` तके। “जव ससुत रघुबीर सुभा स्थाई लक्षन । । सब भावन सरदार हे टार सक नहँ कोय "| सो धिरभाव बखातिये रस सपनो होय ॥ खभाप्रकाश्र । जामे भाव अनेक सव होहिं रहे रपि जादि रपं खन्न । काव्य कला धरे शंकुमते। दोदा। विभावादि थाई यथा दोह न सिलि क्षे होय । अनुमायक मायक कदत रस सस्वन्ध सु जोय ॥ भटटनावकमते। विभावादि सर॑योग ते माजक भाग्य बखान । जदा हाय सम्बनख यह. तहा सुरस पट्िचान ॥ रसतरंगिनो । | जरह विभाव अनुभाव भिलि सालिकंञौव्यभिचार। पररनघाई भाव ते परपूरन संचार ॥ 1 व = = य ~ = == = +~-~ = -~---~--~-----------~-*--- सान ङर्‌इस्य | ५ भ र्रसये । (८ से सुख इ नह्य क्षा सिले जगत सुधि जात ई गतरस मे सगनमयेसु रसने मात ॥ = समभाप्रकाभे। सिलि विसाव चनुभाव अरसं संचारौ ञे चरान्‌ ।, उपजावत रस रुचिर यों ज्यों निज चंगन पान तासे कई कहत उत्पत्ति ल्त हे तरह क्ाई“ ठेसो कहत उत्पत्ति हय तौ क्षीला राम देखि फेर दाम देखिवे की चाह नादं चादौ अरसं रस द्भ्व पदार्थं चारी याते अनुसान होत ड, लीला राम ते रास अनुमान मयो एेसदौं विभावादि तें यनुसान ड तह आन करौ अनुसान ते का- रज नाद हत जैसे पव॑त में धूम देखि अग्नि अनमान कौन तदह पाकादि त्रिया नादौ सिच्च ड लीलारासतेजेा साद्व रूप दय मे सात तौ काय॑ हव ह एेसेद्रौ रस, जैसे ख्य॑म्‌ मनु >~ ~"----~------- -------- कड देखना करा लिखा तौ गसाई' लिखी-- --+--* ---- ----~ २० सानसरस्य । ~~------ विधि रि हर तप रेखि अपारा इतं ड खि से सरूप लों विचार कैसे अनजाने याते सेग कषा चादौ चस व्यञ्चक सनका सत डे यामे वत गन्ध हद्धि मय तै नाही लिखतं तदा प्रथस शृङ्गार लचन । ससाप्रकाशे दोद्ध। रस्य देश चस चातुरौ सतै चारि दै वैष इनत तिय पिव चित रजन्‌ मधुरा रति सुचिशेष ॥ वाता । जषा नायक नायका संयोग चाहे सो सधु- रा र्ति। दोष ललित अंग-संचरनते सो रति पाव प्रकष । उपजत रस शृङ्गार सो कविजन कहत सदर्भं ॥ हे प्रकर ङ्गार रसं कहि संयोग नियोग । सिलिगो चनसिल चादि दै बरनत पंडितल्येग॥ / | संयोगा । ८^ “न्निज्ञ कर सषन साम बनाये? । ?सौतदहि पडिरये प्रमु सादर ! दृह रास जानकौ पर- ८ सानसखरहख्य } २९१ । संच्परौ रतिख्यादई यावै शृङ्गार यक्षै दिव क्ष्ण सात्र रंग जानिये | थ्वियोग। रखरदस्ये। अद वियोगं कहि पपच विधि जह प्रव च्रनृराग विरह इरा श्राप पुनि गसन विदेश विभाग ॥ | स्य ५ ~ © | स्मर आलंबन विभाव कटाचादि अनुभाव इषं ॥ | | पूर्वातुराग जथा । लोचन सग रामहि उर चाग, ` | फिर अघुन यौ पितुवस जानौ ॥ विरद । | निसहि ससिदहि निन्टहि वष भती 1 लुग सस भई सिरात न रातौ ॥ | ईरा । | गौतसतिय मतिसुरतिकरि नद्पररसतिपदपानि ई सन उिदहसे । पाप) विरह विकल भगवन्तहि देखी ! नारद्‌ सनमा दो विशेषौ ॥. सोर श्राप करि घंगौकारस) सहतःरास नाना दुख मारया ॥ २२ मानसरहस्य । । विदेखगसनयधा । ^ चलन्‌ चहत बन जवन नाधा | श्रथ पूर्वानुरागको दसदसा। , नयनप्रीत १ चिन्तार संकल्य ३ नीदनास कशता ५ रुचिहानि & लाजभग ऽ उन्द्‌ सर्छा € खल्य १०। नयनप्रीत जथा । रेख रूप लोचन ललचाने 1. रि खिरि पितापन सन चति छोभा !८ सस्षल्प । बरौ संम नतु रहीं कुमारी । त्राखता) देखि उमहि तप दीन शरीरा ।., रुचिदान। पुनि परिहर पुराने परना । ^ लान भंग) चलौ उमा तप हित हर्षाद ।“ उन्य्राद्‌। तुस सम पुरुष न मोसम नारी ।~/ ` इलयादि, असजो शृङ्गार को ्ाल्ंवनविमाव नायक नायका ताक्षे अनेक भेद दोत दं, 1) -~-.------~~-~"--~--~ ~~~ ----~-~-~----~-~---------------------~ सानसरहश्य । २३ नाध) परति उपपति बेसिक चिविधि नायकमेदवखान ¦ | तिरक 1 जाते विवाह होय, उपपति आनको सिक जाते धन कौ चाह रतिरहैत्‌ होहि। प्रतियधा । सोहत सिया रासकी जोयै। उपपतियघा । छल करि टारिव तास व्रत प्रम्‌ सरकारज कान इत्यादि । चस पति क सेद्‌ अनुकूलादि वहत होत ई । चस नायका प्वदौया, परौकया, सा- सान्वा । नो निज पतिसोँ रति करेसो भ्व कीया, पर पति सो प्रीति करे सो परनौया, जो ध्र॑न कौ चाह राखै सो सामान्या । सखकीयाजधा। पति देवता सतीय मर्ह सात प्रधम तव रेष । ^ द्त्यादि वहत भेद होत हं । श्रध हास्यरस । जर ्रजोग को जोग पुनि उलटो लखिये काज 4. ~ = एः (त्‌ ३४ मानसर । "~~~ = नुरो- रूप चितवन चलन हास विवर विभाव] सन्द सध्य अङ्‌ उद्ध खर ₹ँसिनो हे घलनुभाव ॥ . रघ उद्ेग ङ्‌ चपलता ते संचारौ भाव । दूनते निलय कवित्त मे इहास्य व्यंग जह होय । (१ (त) (८ कोवि सुहृदं सव रसन से हाखस्स्य हे सोय ॥ ४, यधा ९, नाना जिनिस्‌ देख कार कौसा । पुनि पुनि ईसत कौश्लाधौसा ॥ इहा बानर विभाव इसन अनुभाव रष सं- चारौ । हाश्यव्यंग खेत स्ग प्रथुदेव । परध -कना) दुखी देखिये सिच कौं खतक ग्ाप्रयुत बन्धु । इलते उपरजत सोक लखि टारिदयुत चतिचन्धु। श्द्न कंप अरु रोम तन ए अनुभाव वखानं। सोह मूर्छा दौनता तै संचारी जान ॥ नते ल्य कवित्त में सोकव्यंग जहं होय | कवि सुहृदय सब रसन मे करुना रस तहं जोय॥ [ यथा । .“च्रवगाह सोक समद्र सोचह्हिं नारि नर सानसरषस्य । २५ व्याकुल सहाः । इ दशरथ सरन विभाव को उद्टौपन रास साता सदन अनुभाव, सोह दौ- नता संचारौ, सोक थाई, याते कसना । अर. कोई कड करुनारस दौते तौ अधिकारसैक्े सेद मे रस होत § । नखे इनूमानयु अयोध्याकाण्ड कथ गवन करत आनन्द वौं प्राप्न होय दं । अस॒ सतौ मौ परति साध रेसेरहौ वीभत्स सें भौ- ससेन दुष्रणासन को रुधिर्‌ प्रियो । ्रध रौट्ररस छच्तण । गर्वं वचन रिपु रन लखत चौर कटे हधियो । इनते उपनत क्रोध हेण विसाव सरदार ॥ श्कुटोकुटिल अरुअसनहग अधर फरक अनुभाव गभं विकलता चपलता ते संचारी साव ॥ इनते द्य कवित्त सें क्रोघ व्यंग जँ रोय । कवि सुष्द्य सव काहत हं रौद्र ह सोय ॥ । यथा! जो सत संकर कर सहाई | तो मारौ रन्‌ रामटोदाड ॥ २६ सानस्षरहस्य | इरा इन्द्रजीत विसाब भुजादि फरकाव अलु- साव गभ॑ संचारी क्रोध घाद तावै रीद्र। परध वोर कै विभाव युद्योदाक दया वहरि धर्यं सु चार प्रभाव ¦ उग्र जौवं जेते जहा ते किये चलुभाव ॥ वचन असनता बदन की अर्‌ फलै .सव चंग । ए चनुसाव वखानिये सन नौरन क संग॥ वार्त। उग्रता असया संचारी, उत्साह थाई ससता की सुधि लौ बीर सस सुधि मलते रौद्र द्लसे दतनो मेद्‌ । यया । सुनि सेवक दुख दीनं दयाला । रकि उदे दोउ भुजा विशाला ॥ इषा वैरी कै बल को सेवक दुख उदीपन विभाव सुज फरकब अनुभाव आापनौ उग्रतां बालि श बल वौ तारौफ़रन सुहानी सो सूथा उत्याह थाई याते बीर । इन्द्रदेव पीत रंग । सामसरइखय। २७ अध मयानक्त। वाघ व्याल विकराल रन सूनो वन ह देखि । जोरावर अपराघवुत साव भयानक लेखि ॥ कप रोस प्रखेद्‌ तन ए चनुभाव वखानं। सोह सृरच्छा दीनता ते संचासौ जान ॥ दनतै शल्य कवित्त सें चरति भय परगट होय । कवि सुहृदय को मगनसन कहत भयानक | यथा . "हाहाकार करत सुर भागे ।› इर रावनं' जोर, विभाव, देव, कंप अनुभाव, दौनता सं- चारो, सय धाद, युम दैव, नौल संग । , श्रध वीभत्स । ॥ चरनुभावन को देखिवो सुनिवो सुमिरन जान |. अर निषिद्चक दज ए ग्लान विभाव वखान ॥ निन्दा कोरिषो कस्य तन रोमसु डे घनुभाव। दुःख श्रसूया जानिये ड सच्चारीं भाव ॥ कवित च्ल्य में ग्लान जदं इनते परगट होय । नव रस में बौभत्छ रसं ताहि कहत कवि लोय॥ [1 भ भन >~ ~ २८ माभसर्ट्सख.। यथा) ` श््रोनित सर क्षाट्र सयकारौ' इदहयःतै रास खर्‌ लिकरन चये लौ चंमौ बौसत्छ जालिये। तदह सक्चादिक् विभाव चरु देखनष्हारन कै रोघ लुभाव, अरसुया संचारी, स्लान याङ्ू, काल डेव, नौल र्ग ॥ श्रथ प्रहुत र्ठ ठे विभाव-दीष्ा) जष्टं अनहोनौ देखिये बचनरचन अनुरूप । अह्ग,त रस कै जानिये ए विभाव स्ार्प्र ॥ बचन कस्य अस रोम तन ए कहिये अनुभाव । रघ संखचित सोद्युत ते संचारौ आव ॥ द्रनते लय कवित्त से व्यंग चाचरजद्ोय | नी रक्त घे जानिये चहतस्स सोय ॥ यधा) | ' . सती देखि कौतुक सग जाता" दा है (नेन ॥ सदि बैठी" इहै तकत, तरह सम विभाव, कस्य अनुभाव, संका मोद संचारो, अचाचरल.व्यंग, क्रामदेव पीत र्ग याते अदुभुत। ... .. मान्लरहस्य ३८ प्रथ सांतरमरकं विभाव । सिद्संडलौ तपोवन कंधा जगत सससान । ` ए विभाव अतुभाव पुनि सव मे ससतान्ञान।॥ ताको लक्षण 1 तत्व न्नान ते कवित से जह उपजत निवद्‌ । वाहत सातरस तासुसोंसो हे नवसोषेद्‌ ॥ ्ीरन रष संचारी जानिये । सोरटा। मन इरिपद चनुराग तज्ञ कुत्व नाना सकल । | महासोऽ निसि जाग सोवत वीते काल वद ॥ इह नाना इतिहास विभाव, समता अनु भाव, घौरज इर संचारी, निवेद घाई, विष्णु देव, खेत रंग, याते सांत, अस कोड तीन रस अनुमानत दास सिष्य वात्छल्य अस कोद च- नहीं सें भाव ष्वनि समानत दस्मं देव रति. भाव घ्वनि सिष्यमं मिच रतिभाव च्चनि वा- त्सल्य मं पुष रतिभावं ध्वनि । भावष्वनि छन्त । संचारोणएव्यंग के देवराज्न रति होय 1 ^` ज्रं प्रधानता करि कहत भाव धुनि रहे सोय ॥ १५) ~ -------------------~---~-~-~--- -~--- - ----- ~~ --~-----~---+ क --न ० ->~०--- ६० सानसरुहश्य । _.-------------------- [ ------------- ~ -- संचारोभाव ध्वनि वधा। जवे जब राम अवधसधि करदं । तव तब वारि तिल्ाचन मरही द््टा अवध सुसिरन। रवस्तिवधा। भरत सुभाव न सुगम अगसद्भ । दृहा कवि उक्तिं देवता विषै ई । राजरति यधा] द हस सेवक खास सियनाद्भ । ^ सुनि रति। । 'भनवंस सव भूप घनैर इदा ते असीस लौ पचरति यधा । ४ लोचनचोट राम जिन हों 1 ्ातरति ! ~“सौतासासचरन रति सोरे! पसर चीर जानिये श्र जहा अनुचित रसदहोय तह रसा मासं अनचित भाव ते भावाभास । रस्ाभाख यथा! च प्रभु लछमन -प्रहि प्र पठाई' । तोद एक स॒पनखा कालकेय राभ लछमन सो दति ग्राव रसाभास्न । ५ सानस्रषटस्य । ४१ भावाभास यथा| ९ गुरं सन कदा करिव प्रसु सोर । ५... रामडि समरतदहि सेट न होई ॥` “` इर अनुचित चिन्ता । _ 0 भावोख्य । लैकैडं सन जो काष्ट रदेस । सो विध अलु दुसहदुख दय ॥ -~> इहै इर्वाभाव को उदय । सावसंभि। [क ५ तेग्धुसनेंह सरस इहि ओर ।` ~) ४ उत साहेव से ववर जेरा ॥ ङ्प सेहचासदटोभावकौ ससि डे। भावसवसलता। चकित चितै मुदरी पहिचान । . रष विषाद्‌ द्य अकुलानौ ॥ इहै सोह इषं विषाद्‌ उद्वेग कौ सवक्लताः । भावसांति। - विसर हरष सोक सख दुख गन । .. इह भरते हृदयम जो भावरडै सो सान्ति इहै यद्यपि रस ₹है तदपि सावसुष्टा जानिये.। ४२ सानसरद्स्य |. | टोद्ा । | रश खाडव सव दै तं गह्ध" धावं सरसात । | ष्यं सेवका क्े व्याह सें राजा चकते बरात॥ | । यथा । ˆ हरषि चके सुनिवर कै साधाः । सदा राम । संग चराचर रहत तथापि मुनिसंम वार । | । | ६ति लसंलक्रम व्यम ध्वनि । (\ \ मथ प्लष्टक्रम व्यंगध्वनि। “श्ट खथ दून दुहन तें भई सौ परतीतः सो तीन रीत कतौ, शब्द शक्ति १ र्थं शक्तिर | उभय शंत्ति २ शब्द्शत्तिं जहा घान पर जायं | शब्द्‌ एते न निकसे । त" श्रव्दशक्ति यथां । | द्धा गुनिन रेख तिन खंचौ ।' . सरत सुच्राल होहि यदह सची ॥ । इष्टै गुनिन रेख खीाची भुच्राल तें सिद्ठ होत चानतेनादींलोन्प कहो राजा करोतौ गुनौ असत होय धाते भरत पृथ्नी मे रदिद्धं। सानसरच्खय । ४२ रव भर्थशक्ति। जट पर नाय शक्ति दिएतेव्यंग र्थरङ् सौ अर्थं शक्तिं तामे प्रथम तीन मेद्‌, खतः सं भवी कावि प्रीदधोत्ति कवि निव्ठवक्ता की उक्ति। वातत जगतप्रसिच धर्यते खतः संभवी यौ कवि कारो प्रौटसो कवि प्रीटोक्ति जैसे जसस्वेत दा. लंक स्यास ) दोहा । दाष काव जडन सों वातै विविध प्रकार । उपमा मे उपमेय..को देहं सकल अधिकार ॥ दल्यादि, चौ कविन कौ निषिद्वता कीं वक्ता कौ उक्तिते बरनेसो कविनिषिद वत्ता कौ उक्ति! -----~-~ ~ -~-~-~----~-~--~-~-----~ =-= ~~~ --~~---------~---~--~----~--~---~~-~ वसु सच्देय। | लर विशेषगन वाक्च को अर्थं चमत्‌क्रत होय । । अलंकार ते भिन्न जो वस्तु कहावै सोय ॥ श्रथ सखतःसंभवीवस्तु ते वक्तु यधा । ध ह पलंग पौठ तजि गोदर्हि डोर 1. सिय न.दरौन पग च्रवनि कटोरा ॥ ६४ सानसरहस्य दह जानकौ कौ सुकुलारता वस्तु तै, बन जिन साध लेड यह दूसरी । ॥ स्तःसंभवोवसतु ते घल कार। .“ पराहन क्सि जिसि कठिनं सुभा । | तिनहि कलेश, न कानन काञ ॥ इहा जानक कौ सुकुमारता वस्तु तै, उ- परस? अलंकार । प्रथ खतः खंभवोश्रलंकारते च्रलंकार यथा।. कलयनेलि जिमि बह विधि लासौ । सोच सनेह सुधा प्रतिपालौ ॥ ` इषा उपमा अलंकार ते रूप अलंकार । रध खतः संभवी अलंकार ते वस्तु यथा] चन्दक्िरनरसरसिक चकोरौ । रविसन्परुख सष सकडि न नोरी ॥“ द्द दृष्टान्त अलंकार वै सुकुमारता वसु । जघ कविप्रौदोक्तिं वस्त॒ ते वसतु। तब रिपुनारिर्दनजलघासय । | भरो बहोरि मयो सोखारा॥ (र सानसरचखय। ४५ इह्य रामप्रताप वक्तु तैवेरिनको चासद्ू सरो वस्तु ! सट्विप्रीटोत्ति वस्तु ते च्लंक्तार । दश्ड जतिनकर भेद जरं खत्तक न्टल्य समाज । लीतो मनसिज स॒निय चस रामचन्द्र कै राज ॥ इहा यमराज वत्तं तै परिसंख्या अलंकार ।. - ` कवि प्रीदोक्ति ्रलंकार ते श्रलंकार रोदा । छाश्रस सागर सान्तरस प्रन पावन पाथ! सेन सनो करुनासरित लिये जात रघुनाच ॥ ` | इद रूपक ते उतप्रक्ता अलंकार |` ` १; कविप्रौदोक्ति श्रलंकारते वस्तु । नास पादू दिवस निस ध्यान तुम्हार कपाट । लोचन निज पद्‌ यन्विवा प्रान जादि कैहि बाट द्या रूपक अलकार ते जानकौ विरहवसतु । ` अरस कवि निव वक्ता कौ उक्ति कनिनलीर्वध्ी सो वक्ता कह दइतनो सेद याते न्वारे उदादहरन नादौ {कये अशू शब्द अधते होय सो उभय धनि यथया) लखन लखा प्रभु हदय खभार्" इहा लक्त- ` । ४६ सानसरहस्य । ~~~ ~ --~- ------ ~~ ~ ~-------------~- | मन सौमिच क्होतौ नहो याते हृद्य नौ । जाननहार तै शब्द्‌ श्चि अस समयधम सं रास | जानि कै भाद सौ शच सयोता इतु अपनी । सेवकतां जाहिर करत सो समय सव च्रौसर | सम कहो तोभी होय याते उभय सक्ति अस धुनि | क्षे मेद १०६४०५५ अक सध्यम कोाव्यक्तै भेद ८ | खपरंग १ सुन्दर २ सन्दिग्ध २ तुख्चप्रधान ४ | वाच्यसिदधाग ५ अस्पुट € काकचिप्न ऽ अगृढु ८ | अरपरांसता सें चार सेद्‌, रस्षवत प्रेयो अजस स- । साहित । | रसखदत लच््च। | द्ध रस चंग होय सुख्छ चान होय सो रसवत य्या) अति सुकुमार वुल मम बारे |“. | निसिचर्‌ सुभट सहावल भारे ॥ | इहा वाद्छल्छे को च्रंग मयानक। नागपास बस मये खरार रनिगत अरलखं एक अविकार ४ कि ष्ठ" --* सानसरच्दय) 89 इहा ्रदूभुत को असंगसान्त । सियदि विलोकित क्यों धनु कैसे । -चितव गण्ड लघु व्यालदहि जैक्ते ॥ ` इहा शह्ार क्षा चंग वीर । श्रघ प्रेयो छष्तन । लद साव चंग मान कैज चंग तदी प्रेयो । यधा! सेह नवल तन सुन्दर सारौ । | जगतजननि अतुलित दवि सारौ ॥ * दह शृङ्गार का रंग देव रति साव धुनि। रव उञ ल्तन। ` जरौ चमाव चंग हाव चानकाऊ च्रंगौ तषी ऊर्जस्‌ । | यघा) परसु विलाकति सर सकिंन डारी। ६ धकित भये रजनीचर कारौ ॥ | दष शत॒ में साह अनुचित यात वीर कव अरर भावाभास.। | (१ ० अ ४८ सानस्षरहख । , ` रेखि रूप सनि विरति विसारो. । बड़ी बार लगि रड निह्रौ ॥ इष मनि सें रति अरनुचितसा दाश्य शा अंग याते रसाभास । रथ सक्ा{ह्ित। जौ सान्तादिक अंग हाय आन अंगी हाय तदम समाहित । १ यधा) ;“ , पुनि संभारि उटौ सो लंका, ८ जारि पानि करि निनयं ससंका ॥ दह क्रोध कौ सान्तिनीरक्षा चंग! ति श्रपरग। पथ श्रसदरं लत्तण। वाच्य ते व्यङ्ग स॒न्दरन हाय सा सुन्दर) यथा नाध उसा सन ए्रानग्निथ खडकिदिसि करद्‌ । छमह सकल अपराध चव द्धौ प्रसञ्च वर देहु ॥ ` मतसर । ४९ | । | हा सतौक्ञा अपराध चसा नाहीं किये | यह व्यङ्ग सो वाच्य ते सुन्दर नादं । | परध सदिग्ध। | जहा व्यंग कषा निश्चय नारीं तहा सन्दिग्घ। यधा) | ससम वचन जव सौतावेली।, .*,-*“ इरिप्रेरित लचसनमति डाली ॥ ` दूरा सरसम वचनम बहत अधे न जाने कहा करे, तुम मरत में सलि ग्यक छत्री काय धलु वान धारन करिरनते डरती याक निश्चय नाहीं याते सन्दिग्ध। अध तुल्यप्रधान । जदह वाच्यव्यंग बरावर होय सो तुल्यप्रधान्‌। यधा) ~ ~~~ == व 3 ष्क कादं डक कहि करदं रस इक्र क- |, रहि कत न वागरीं। इदा हम कहत नारीं करि दिखाद्रहै सो वाच्यकषी बरावर व्यंग है याते ठुल्यप्रघान । ~----------~------- "~~~ ~~--~---~--~-~-----~-~-~----~------*~-------- -------- ~ ५० सानसरहसय |` वाचयसिश्ांग लचण । ज्म शब्द्‌ सिद अनेक अर्धवापे दोय अर्थ को कड सो वाच्य सिंग । यघा । वेगि बिलस्ब न करिय चप सानी सवे स्मान्न । सुदिन सुमंगलं तवहं जव रामहोहिं युवराज इह जव रास बुवराज होहिं तव सुमंयल, अस जं ह्रै तवं सुदिन वृभाव अवै रपम वन गवन करिद्। अथ अस्फुट लक्ण । जो वदत कलेश ते च्छङ्ञ होय सो अस्फुट । यथा) गीतमतियगतिसुरतिकरि नदिं पश्सत पदमान। सन विसे रघुबंशमणि प्रति अलौकिक जान दृह सामच्तरन पर पतौ सरति करि अस प्रोत मे यद्यपि बहत पोष कौनो तथापिं बहत क्तो ते पाद । ~~~ ---~=_--~---~~~_~~~~~_-_~_~_--~--~----~_~----_--_ ----------~---~------------~ प ~~~ „~ - ~--- --- --------------~-----~------~ ------- 0 4 =-=~---------------------~ ------- ---------~ | . सानसरहस्य । ५१ काङुसवरमेद यधा | ई दससौस मनुज रघुनायक । | जाके हनुसानसौो पायक ॥ ¦ इदा राम का सलुज ह परगुटु। च जो तुम होते सुनि कौ नाई । < & तो पद्रज सिर धरत गुसाई" ॥ ङ्द तुस दौर देष वन।यच्राये सो प्रगटकही | इति मध्वमकोव्य। श्रध गुन। चित्त में आनन्द करे रसको भिद्सो तीन भाति । माधुज॑ं, ओज, प्रसाद्‌ । माघरर्जं लच्ण । जाक सुनत चित्त द्रवै सो साधुर्थं। यधा | कंडनकिद्धिनिनुपुरधनि सुनि! - श्रध ग्रीन लक्तण। उडत वर्नं टवर्गतेष्ोयसो भ्रोज। 8 ५२ मानसरदस्य । ` ~. ~~ ~~--~----~*~------~-- --* --- 923 | यचा । | गाटकटहिं जबक भूत प्रेत पिसाच वष्र | संचष्ी । | । चथ प्रसाद) | जहा भौघ्र र्थं जानो जाय सरुचि वरन | परेसो प्रसाद्‌ । | क्ञानी तापस सूर कवि कोविद्‌ गुन आगार! | ैहिकि लोभ विडम्बना कौन न यह संसार्‌ ॥ | श्रध श्रलंकार लकणं । काव्यकलाधरे वरता] रस श्रु व्यङ्ग दुहन तेन्यारो होय। अर्थं चसल्कुत शब्द्हि. भूषन सोय ॥ उपसालच्ग चमत्कार चन्द्रिका, उपभानर उपमेय जह वाचक धम सुचार । पूरन उपमा ₹हौन ते लुप्तोपमा पचार ५ पूरन उपमा तथा । .-तसन अक्षन अंवृज इव चरना । ¦ अशनध् अंबु उपमान, इव वाचक, ' चरन उपमेय । | | ~~ -.-----~--------~-----~-------------~------~---~---~---------------------------~ £ ¢ + 2 त ~ . ~ ------------- ------~~-----~-~-~-~--~-~----“ मानरदर्इस्य । ५२ वाचकलुप्ता यधा) बदन सयङ् तापचनयसमोचन' । वदन उपरमे मयक उपयान, तापसोचन धमं । प्रघ घमलुप्ा यधा । ५प्रसु भुज करिकर सम दसक्न्धरः । भुज उपमेयं, करिकर उपमान, सर्म दाचकं । प्रे इपमानलुप्ता यधा । "नखदुति दय भक्ति तस र्ना । नखं . उपमेय, दुति धरम इल्यादि । श्रय श्रनन्या। उपसानी उपमेय कर काहत श्रनन्या ताहि । यधा] इन समं ए उपमा उर आनी) ~ छ्य उप्रमानो पेय लच्तण । उपमा लागे परस्पर सी उपमा उपमेय । यधा) बे तुमसे तुम उनसम खामौ ` श्रय प्रतीपे कंठाभर्णे। उपमान्‌ जह उपमेय हो जाय तहा पि- स्लोद्धे प्रतोपर मने। , ध सानसरहस्य । यथा| उतरि नंहाने जमुननल जो सरीर समः खास । | दुतीय प्रतीप । उपमान जदा उपसेयता चंडि फिर ताहि निशद्र दूजौ भने । ऽ यथा 1 |` जिनक्षे बल कर गर्भ तोहि एसे सुज अनेका । अरर कोड कहे सनुष्यं भर कै राम उप्रमान | है तो जव दैप्रवर सए तव इन्द्रादिकां सवके उ- | परमान भप । | वरवाम्यथधा) „` का घृघट सुख मृद्‌ चरबला नारि। चन्द सरग पर सोहत इहि अनुहारि ॥ ठतीय प्रतीप । वर्म वस्तु वर्नं हो अवर्नं को अनाद्रेसो ती- सदो प्रतीप कवि दलह गनायो ह । | -यथधा] कुलिशं चाहि कटोरता कोमल कुसुमड चाह चित खगेस रघुनाथ कर वृक्ष परे कह काहि ॥ ` --------*~-- सानसरइस्य | ५ 1 चतुर्थप्रतीप। ललितललास लन रहौ बरन सो रौर कौ उपमा वरनन होय ताह कहत प्रतौप हं । यधा) | सौयवद्न सम हिमकार नादं । । पंचसप्रतीप यधा! | | स्षोटि कासं उपसा लपु सो । श्रध सपक ! वेरनत विषः विषे को करि अभिन्न तद्रूप । ¦ अधिकं रौन सम उक्ति सो र्पक विविध अनुप श्रधिक तदप यथां । | इरिहरकंथा विराजत वेनौ 1 सुनत सकालसुदमंगलं देनो । न्यून यथा वरवा 1 दीः सुज कर हरि रघुवर मन्दर सेस , एकं जौभ कर लकसमन दश रसेस 1 सस यधा.) , केदरिसावक जनमन बनके, ~ अधिकां श्रभेद 1 | गुपद्रज. खदु मंजु अंजन 1“ ,. --~^~~~~~-----*------ ~. --~--~------------~-----~---~---~-~--~~ ~~--~~----~~----------------------~------- ~. ५६ सालसरषटस्य |. न्यभ | प्रतिं ख्लजे विष वकं कौगां | | खसयथा | | संप्रति चकदैः भरत चकं सुनि च्रयसु खेलंवार। | तेहि निस अश्रमं पौंजरा गले मां भिनुसोार॥ . अथ परिनाम। विष विषे हो फर जानो पंरिनासं । , “कार कमलेन धनुसायथक फैरत । जियं कौ जंरन हरत दसि डेरत॥ उलेष सेक्तण । | संलिंत ललास कर बहते कै एक जदं एवे डिए उलेष । प्रधम यां । |. ददेखंहि भूप महारनधौरां ॥ ते इहं विधिं रहा जाहि लस भाज इदा लो। | दितीय यथा । ` राम कौम सत कोटिते. ससि संत कौटि लौ ,अथ सुमिरन भमस॑देह कै नामी लन इ. .~------~-~-~ सानसरहस्य | ५० | सुमिरन यथा| । | बौच वास करि जम्‌नदि आये | निरखि नौर लोचनजन् छाये ॥ | कपि करि दय विचार, टौन्हमद्विकाडार तव | , जान यशोक्र अंगार, दीन हषं उरि कर लियो॥ स्वस सद्द) राम लखन सखि होहि कि नादी), ्ुहापन्ति सन्षष 1 चीर के ्रायोप्र ते सच छपावत धर्म स॒दा- प्रन्हति कषत द । यथा! वन्न रोय मोर यह काला । देत्वपन्ति लक्तण । | सुगति सो यहे डेत्पन्ति # ˆ चथा) “तुव प्रताप वडवानल” ते “भये वहोरि भयो तेहि खारा” लौं | वरवा)। करुद्ध न निसि अंधियरिया दिन नरि घाम) |. जगत जरत असं लागत मोहि विन राम। 0 ~~ ---~ ------ -- -- - ~ ~ 4 ¡ भ मानसर्हस्छ , प्ररयस्ताजपन्द्‌ति लच्तन ; ॥ प्रयस्तापन्हति व्खाने आन में जो चान । । यधा] सौन मे नहिं प्रीति सजनी पंक सं नहिं प्रेय॥ एक सति गति एक व्रत यह भरतौ मं तेम ॥. व ~= | । 1 ॥ | | प्रश्र श्वांतापन्दनि। | खनके सयते श्रस थ्रसको निवार तद्द | 1 श्ान्ताप्रन्हति वखाने कवि आद्रे । | चधा | ष्ोहि न त्ति न वारिद साला, तेसन्दटो- | दसै श्वन्‌ ताटंका।सोप्रसु जनु दाभिनीली अथ दछेकापन्त्ति) ` जुक्ति करे जरं परसो बात टुराय। यथा । | ्रक् न परौच्छा लीन गुसा । कोन्ह प्रनास तुम्हारे नाड" ॥ श्रय कौतवापन्ेतिलचन 1 | स्तेतबापन्हति मे सिस फं अरान्‌) पटं मोहि मिस खगपति तोद । रघ्रपति दीन बडाड़े मोरी |. सानसरहश्य । ५€ | --- ---- --------- - -- ==> र 0 - -- ---- --~~~-- चरथ उप्र क्ता लन्नन। | उत्म्च्छा सस्सावना वस्तु छतु फल लेखि | | वस्तु दिविध उक्तास्यपद्‌ अनुक्तास्पद्‌ पेखि ॥ | चेतु सुफल सिदास्पमद्‌ असिदाद्यपद्‌ सान | व।चदा ज्म न कहत ह रास्योत्यच्छा जान जाकी सम्धावना कौजे सो सम्पाव्यद्रान उ- | पसान, चरस जा विषै सम्भावना कीजे सो चा स्पपद्‌ उपमेय, संभाव वाके विषय संभाव्य मान [न 1 1 धरस्‌ संमावना कौ दौर दाड रहै सो उक्तास्प- पद्‌ वस्तृत्मे च्छा वध्रा। कारत वतकरहौ अनुज सन सन सिय दप लुभान्‌ सृ सरोज मकरन्द छवि करत सधुपद्व पान सुख उपमेव, सरोज 'उपमान, छवि विषव मकरन्द, विषय दटोड्‌ पाये याते उक्ति विषया , श्रलुक्रि विषया वस्तृपर ्ञा। जहा संसाव्यमान रहै संभावना को विषय नाहीं रहे अस क्रिया कै पाष्टे बाचक रवे सो अन्‌ तास्पद्वस्व्य च्छा । -~-~-~---- *~-------* -----~ ~--~-~ ~ -- ~ -------~----- ------------ -~ -~------ ~ ----~---~ ६० सानदखर्‌रद्य | - सघा | ` 'भयद्े सनहु सारुत अनृकुला ।' ते द्र डने क्रिया ताक्षे रागे बाचक् डे, अरु जदा अषैतुका देतु सानेसो तृत्मच्छा, सो सिष विषय में हायता सिद्विषया, चस असिद्वि- षय सं हायते असिदविषया । चिदविषया तम्र चा यथा । ~ सनद्‌ प्रेस वस विनतौ करहीं हमटहि सौय-पद्‌ लिन परिरं ॥ ते इद विनय डतु नादी ताक्षेा इत्‌ साना असू विषय सिद इ। अथ अविडविषया हेतुवोका यथा । (नरह बिज्लकत अति अनरागाः । ते तेहि दूरषा बह आन दर्येनलो, ता यह अचत ताके हेत्‌ साने अकत विषय चरसि इ चरु च- फल कषा फल माने सा फल उतम च्छा । ` । सि€ विषयाफलोत्ता यथा । अति कटुबचन कात काके । मानद नान जरे पर दद ॥ .--~-~ ~~ ~~~ . ~-~------~~-~---~-~~-~--------~-------~--------~------- -~----~ ,---- ~~~ ॥ | -----------~+ स्प्रनसरख्य । ६१ | प्रसि विषखाफल्लोक खा दथा । जनु सद सचे दहन डित सये सगुन इकः वार । सं{चे हमे कौः इच्छा फल । परय रूपकात्तिश्रवोष्धि श्रलंन्तार्‌ सक्तन । रूपकञतिशयरउक्ति जदं कैवलदहौ उपमान। वधा] असन पराग जलज यरि नौके! ~ ससिहि भूष अहि लेमे असौ के ॥ ता इहा कर नादौ कसल साच पायो यारी | | रीति ते सुख नारीं ससि पायो । श्रथ सेदकातिशयोक्ति लत्तन। चीरे पद ते जात ड सेदकातिसय उक्ति। यथा] चरौरैहरनिविलोकनिचितवनि ओर दचनउद्र तुलसी ग्रासवधु कित देख न ग्ड समार ॥ श्रध सम्वन्धातिशवोक्धि । समस्वस्ातिशयोक्ति जं देत अजागहिं जेग । यथा! जो सम्पदा नौचख्डह सोहा 1 -" सो विलोकि सुरनायक सोद ॥ ` [क 9 न रन ६२ सानसरदस्य । .. यजाग जाग कौन दितौय जग से चजाग भेद टूससो गनायेा डे । | यधा) जन्प्र सिंध पनि ब॑घ॒ विल दिनसमलौन सकलंका। सियमख पटतर पाव किसि चन्द वापुशे रंक ॥ चन्द जाग ते चजेाग कौनै। गदि कर्तने मुनि पुलक सहित कौतुकं सु उठटाय द्यि । आक्यं सिवसन ससेत हरि हर खोजन किये ॥ इहा धघलु अकघंन कारन सिय सन कारज मसा साध सयो) अय चपन्ततिशयोक्ति सच्छन। डे चपलातिश्येाक्ति जब कारन सनते काल। यधा] तच शिव तीसरर्‌ नयन उघारा। वितवत कास सयो जरिक्ारा॥ इहा सनन देखने वरावर हे चितवन का- रन्‌ कामजरन कारज। अथ अन्सातिशयोक्ति यथ। । । क सानस्रहस्य | ६ ९1 अश्र भ्रत्यतातिशयोल्लि लद । पूरव कारज हात हे प्राटे कारन जान) अल्यन्तातिशयेाक्ति तरह कविवर करत दखान ॥ यथा) 6 पद पारि जल पमान कटि आापसरह्ित प्ररिवर' पितस्पार करि प्रसुहि पनि मदितगयोालेप्रार इष राम पार जादबेा कारनं, पितर पार कारन कारज, सा वारज प्रवस ह थर वाका षड भावच्तु मी कहत ह । ॥ रध तुल्ययोगिता लदछन। तुद्ययेागिता तौन विधि लक्षन नास प्रघान। कादं वन वर्तं कौ, कद्ध चवर्न च्रवनं कौ, कद्ध वनं चवनं.कौ। =-= - व ४१ वनं वर्नं यथा! सु रघुप्रति सव सुनि मन माहीं}. सुदित सए पनि पुनि पलक ॥ दह सव वनं इं । प्मवन जतन जधा ) कमल कैक सधुकर खग नाना हरमे सकल निसा अरवसाना ॥ ८=-----न £ सानसरद्दय। इहा कस्त केकद्रि चवनं 9 समन श्रवन यथा वद्वा 1 निलय नैस करि असन उद जव कीन) ` निर्खि निसाकर छप सुखमये यल्ौव ॥ न्रपवनं निखाकर चरवनं कौ तल्यजैग्यता दे । श्रथ दीपक लच्छन। | | ¶ दीपक {निजगनन्‌ ते वनं इतर इक भाय । | यघा 1 | केसे कनक संनि पारष पाये) पुरब परखिये सस सहाये ४ इहा कनक सनि अवने, पुसष वनं ताकत कसन पारष पारनं चरू परुष उपसेय सस यात पर साभा परावत चर कदरे कड तल्यनजेगण्ता | दौपक से कदा सेद्‌? 1 | दोषा । एक एक सं घर्म ते तल्यज्ञेग्यता सय वन्‌ चवनंडि ते कड दौपक सन कवि लेय ॥ | वी सानद्रटस् 1 ६५ प्रथ दीपक्षाषत । दीपकं चाहतं तीन हपट आहत कहं चथ. पद चस अथं दुन तै भाषत सुकवि ससर्थ ¢: पद्‌ जथा) न्सर्वं सव गेति सर्व सुरालयः इह रास.उम-- | सेयं दितीय सूप. उपमान तक्षा. एक धर्म यात | दीपकं चरौ सर्वं सर्ब तीन वार रदा वातै-पद्‌ | -------~-----~~- ~~~ ~~~ ----------“ कौ चाहतिं । ` अधीति । “कजहि कैकिल गुंजहि. श्यः कूदि गुजि शब्द भिन्नं पदं एकं = योते अर्थाहति । तीय यथा । । एरी विराजत राजत रजनी । ` रानौ कहहिं विसाकडइ सजनी । रय प्रतिवस्तूपमा । । प्रतिवस्तृपरम कत हँ समुभिं दुवा ससान । धा । | मलो मलाई लेत ह लडँ निचाई नीच ।* |. | सुधा सरटौ अमरता गरल सराह मीच ॥ ६६ सानसरस्य । इं भले बुरे उपमेय. चरस सधा गरल उप- सान ते भल्लाई उपेयं चरमरता उपमान कर एक मये अरु दौपकदौ पकाघ्रत्ति प्रतिवस्तूपमा मे सेद, दौपक से दका धर्म नादौ दौपकाहत्त से | नैस नारौ प्रतिवसतुपसा मे दोड़ हं । | अध टृषटटान्त लच्छभ)। । जरा विष्व पए्रतिविस्व सो दुहन वाज्य दृष्टान्त | यथा! । बडे सनेह लघन पर करीं ¦ अग्निभूमि गिरि सिर ठन धर्डीं ॥ इषा बड़लघुगिरिदढठन अग्तिधूस को विस्वं प्रतिविस्व सावदडे। श्रथ निदसंन। । जं उपमेय सुवाक्य सें उपमा वाक्व संजोग । खसो करत निदर्सना कहत सवै कवि लोग॥ यथा) सुलु खगेस हरिभक्ति विहाई 1 जो सुख चाहे रान उपा ॥ सानसर्हस्य । ६७ सौ सटठ सहासिंधु विन तरकी । ~" चेर प्रार चाहत जड करनी ॥ [२ तो इहा जे सुख चा ३ हरिसक्तिहौन से समद्र पैरो चाहत यह जामे क्षा सम्बन्ध इे। रध दूमरो सेट लच्छन। रवे जै उपमेय से उपसा धर्म सुजान । यधा) । रघुपतिविरह विषमसर भारौ । : तकि तकि वार वार माहि मारौ॥ इहा विरह उपमेय विवमसर कास ताकी सारन तकि तकि क्रिया धरन कनौ । तीय संच्छन। जदह असत सत करि क्रिया करे आनं उपरेश। २ यथा) संग लाय करनौ कर सेह । मान माहि सिखावन इदं ॥ . व व्यतिरेक लच्छ्न। व्यतिरेकहि उपमान ते उपरमे अधिक लेखि । ८ सानसर्हस्य 1 यधा! निज परिताप द्रवं नचनीता। परद्ख द्रवहिं सुसन्त पुनीता ॥ इष नवनीत उपसान ते सन्त उपमेयं अधिक। प्रथ खष्टोक्नि लन । सा सहाक्ति इका साधौ बरने दुहन वनाय । यूघा। बल प्रताप नौरता बड़ाई! -. ` नाक पिनाकडि संग सिधाई' ॥ ड्म नाकं पिनाक संग अध विनोक्ति। डे विनक्ति दहैमीति की प्रस्तुत काष्ं निनं दौन। अस साभा चधिकौ लहै प्रसत कट ते सैन ॥ प्रधस } भवाद्‌ बसन विनुं भूषन भारू ते "विनु हरि भक्ति जाद्‌ जप जागा" लीं । दितीय। सन्त्दय जस गतमदमोहा । ~ पधं समासोक्तिं लच्छन। ` समासोक्ति प्रस्तुत परे प्रस्तुत बरनन सीमं सानसरहस्य । ६€ | | जहौ अप्रस्तुत पुरै प्रस्तुत वरनन करै तै तर समासोक्ति यधा) असन उद ्रवलोकड़ ताता । | पंकज लोकत कोक्षसुष्डद्‌ाता ॥ | इदा असन उदै पंकज कोक प्रस्तुत अस चा- | पमो वियोग चप्रस्त॒त ताको हत्तान्त जानो गथो। | अथ परिकर लच्तन। । द्धै परिकर आश्य लिये जह विशेबन होय । | - यघा। | सुभगश्रवन सरसीरुहलोचन । \ वदनसयङ्‌ तापचयसोचन ॥ | ४ इह संक ताप्रमोचन इे। प्रथं परिकरांकुर लच््न। खासिप्राय विशेष जदं परिकस्चंज्कर नाम) यधा] 9 सुन विनय मस विटप चसोक्रा +` दै असोक प्रभिप्राय सदत हे तुम सोक रडित दी तैसष्टौ हमार सोक इरी ।. ------* ० ( ९० ` सानसरहद्य । शष श्चेष अलंक्घत चर्थं वहू एक शब्द्‌ सै होय। „----. यथा| | भरतःसुच्ाल्‌; हीहि यह सची भुच्राल राजा असस पृष्व तासे घर। अथ श्रप्रसतुतप्रशंसा । अप्रस्तुत क्षै कथन ते ड प्रस्तुत को बोध । च्प्रस्तुत पर्संस सो कहत सवै कवि सोध ॥ यथा] दापय सां रज व्याङ्ल रोगौ ! ~ “ वैद न देव सुन मुनि योगौ ॥ `“ इद्धा वेद्‌ रोम अप्रस्तुत ताते तुष्हार विवाह | इस न करन दे हे यह प्रस्तुत । | अध परजायरक्ति लक्षण । परस्जायोक्ति प्रकार है कषे रचना सीं कात । सिसकषरि करार साधिये जो हित चितदडिसोहात प्रधम) घरी न काद्र धौर, सव कर मन सनसिन दश्यो जेडि राखि रघुवीर तेहि उबरे तेहि कालम न्न ५ ~ ~ ---------------- -----------~------ ~ -~---------------- ~ 2 सानस्चर्‌ददस्य ७९१ इह रघ्वंण विषे वमर ते अति बौरतास- व्याजस ति! व्याजस्तुति निन्दा सिसहिं जवे नडाई होव । यधा) लौस सहाभट सानौ । मूनिकौ न्द्‌ | अधध चाच्प) तोनि सौति चाषेप दै एक निषेधाभास । पहिले कद्िये राप कच्छ बहर फेरियै तास्‌ ॥ दुरे निषेध जो विधिवचन लच्नन तीनो ले । `प्रघम ¦ मर्तविनय सादर सुनिय करिय विचार बहमेरि। । करव साधुसमत लोकसतदपनव निगस निचोरि दम मरतबचन सुनिय पूनि आपद्ध अपनी ८... न >, वावा बात को निषेध को निषेध सरस करे लगे ना इादसे -9 ७ र सारसरहस्य । हितोय। सानुज पटद्य सोहि बन कौजिय सवरहिं सनाय | ल तक फोरिथे वशु टोठ नाध चलीं सै साच ॥ दृहा राप प्रथस कहौ सोहि अनुज सहित घनं मे पठाडये ताको फेरि रोक्यो सै साथ चलौ लतोय। राज देन कडि दौन वन सोहि न सोच लवलेस। तुस बिनु सूपति भरतौ प्रजदि प्रचण्डं कलेत॥ । पनः । हृदय सनाव सोर जिनि होई । रामह जान कदे जिन कोड । सुनह गस तुस कहं सुनि कचं । राय चराचर नायक अचहौं ॥ - अथ विरोधाभास । भासे जवे विरोध सों वहे विरोधाभास । अथे चलेष सोच बस लेखाः ईह अलेघा सेघ विरोध सरो जानो जाय दडै। पध विभावनां लक्षं । तु विन कारन कौ उपज विभावना डे । सानसरहस्य 1 ७ यथा| वितु पद्‌ चे सुने विन काना! ते वितु बानौ वक्ता वड वोमौ। लीं दितीय। तु ्रपूरन ते जवै कारन प॒रन होय । ० ~ ५ यधा 1 कास कुसुस घनुसायकं लौन्हे । .- सकल सुचन चण्नै वस कन्हे ५ टतोय) प्रतित्रखक कै हतौ कारज पूरन सान । यदध) नो निन ने चित अपहर | रिजाई विः वसं करद. ॥ द्द ज्ञान प्रतिबन्धकं ह । चतु; जवे अकारन वस्तु ते कारन परगट डोव । | यथा 1 ४ वोरहि चानि वृहि जेहौ 1." ` भएञ वक्त बोहत सम तेद ॥ ~~~ . ---~------ “-----~-----~---------------~-~ ~~~ ----~-----~-------~--~---------- ~ -- ~ ~ ~~ ९४ सानस्लर्हद्य । "~-~-- ५ ह पाघाणं ते काष्टको कारन उपज्यो। पचस । काद्ध कारन ते जवे कारन होय विस । यधा । जेहि तरू रहत करत सा पौरा । , उरग खास सम चिविधि ससौरा ॥ . इषा सीतत्त तै तप्ता उपजी । घष्ट । क दारू कारज ते जवै उपज कारन हप्र । यधा । ~ जश्त पितासै.सृत करि जाना) श्रथ विशेषोक्ति लच्चन। | ~~~ विशेषेति जो तु सीं कारज उपजै नाहि । यधा । सक्ेड उटाय सुर सुमे । सा दिय हार गयो करि फेर्‌॥ दही कारन रदा अस घनुभ॑ग कारज् नादं मये अथ परसंभवलच्तन | हे असन्छव.ेतु लङ बिनु सेम्भावन काज । 1 ~~~ ~~~ | सानसरदस् । ७१ यधा] 4 अति सुकुमार लुगुल मस वारे । ' निसिचर सुभट सहावल सारे ॥ अथ संगति। तन यस्ंगति काज चस कारन न्यारे ठास । | रौर टीर्ही कीज्यि जीर टौरक्चा काम ॥ चीर काज यारस्िये त्रौर कीजिये दर । प्रधस यधा! जिन वीथिन विरे सव भाई ` घक्तित होहि पुर लोग लुगाद॥ इहा राम विद्रे कारन, घकिित लोग लु- गदः जार्ज । दितीय। ते पितु सातु सखौ कडु केसे । . जिन प्रये सखि बालक पसे ॥ हह सातु पितावन दिये) , ठतोय। । राज देन कड सुम दिन साघा। कष्मो जान वरन्‌ केहि अपराधा ॥ ७६ ` सानसरहष्य । दृहा राज आरण्य करि वन दिये । अधं विषम्र ज्च्तन। निषस अलक्त तौन विधि चनसिलितेकैसंग कारन कारदेग चर्‌ क्छ कारज चरे रंग ॥ चीर भला उदम किये शङ्‌ वदा फ़ल चाय । । प्रधम वथ्ा) सारम चगम भृमिघर मारौ । तहि प्रह नाध नारि सुकुसारौ ॥ दहा राह अगस तुस सुकुमार्‌ । दितोय। ^उपजञे यदपि धलप्तङ्कलप्ावनः चसल अ- नूप (तदपि सद्धैसुर श्रापवस सए सकल अघ दपः पुलस्वक्ल अमल कारन; राबनादि अघ स्यास रूप । टतीव । श्सानौ सरलरस मातुबानौ सुनि सरत व्याक मणः । ॥ शम लच्छन। अलंकार समः तीनि विश्चि यथायाशं कषा संग। कार्ज सें सवर प्रादये कारनहौ के रंग॥ सानस्रहस्य । ७७ श्रम विनु कारन सिचि जा उदयम करते हाय । प्रधम । जस दलह त्त वनौ वराता ।\ क्रीतक तिविधि हाड सग जाता। दितोव। । कस न कहु अस रधुक्लकषेत्‌ 1 *~ ` ^“ तुस पालक सन्तत ग्रुतिसेतू ॥ ठतोय । सेतुवन्ध भद्ध भीर चति कपि नसपन्य उड्ाहिं ॥-| ` चपर जल च्रन्ह उपर चट विनुश्रस पारहि जाहि॥ अथ चिचिन्न। ङ्ष्छिति फल विप्ररौत को कीजे जतन विचि । अयथा] जो नहिं होत सोहि चति.सोद्धी । ~ सिलतेड नाध कवन निधि तोडी ॥ श्रधिक. लच्तन। अधिक दीघं ्ाधार तै जब च्राधेथन्ु होय जो आधर अय ते अधिक अधिक ण दोय ॥ ~ छत भानस्रङदय । प्रधम यथा) वदत उक्छाइ भवनं अति धोरा । मानह उमगि चल्यो चदं ञ्ओोया ॥ भवन अधार उद्छाह आाधेयसो उमणि चछ्यो । दितीय । सकल सुवन अरि रहा उदाद्ध । जनकसुता रघुवीर विवाद ॥ ईइ सुवन चापेय अधिक । रथय उल्य। अलम च्रल्य चाघेय ते सृद्म होय अधार। यथा वरवा। अवे जीवनं कीे कपि त्रासन सोरहिं। कनगुरि्ाकौसुद्रौ ककना होिं॥ परध सन्योन्या च्छन। अन्योन्या दो जंहा ्रापुस् सें उपक्षार । ~ सुलिं रघुनीर परस्परं नवष्ीं ॥ अथ विशेषं । | तौम प्रकार विसेष हे अनाघार अाधैय। | बौ बात कौ सिद्धि को कषु ख्रम्भ जो देय ॥ मानसरस्य । ७€ वस्तु एवा क कौलिंयै वंशनन दौर अनेक । प्रध॑म। तल प्रेस कर मंसं अंसु तारा। जानत प्रिया एक सन मोरा ॥ दृह प्रम अनादर हे। दितीय। कंपि तेव दरस सकल दुख वीते... सिक्ते आज मोहिं राम सग्रीते। . इहा कपिदरस ते राम॑दरस पाये) टतोय यथा । निज्ञ प्रसुमय देखीं जगत कासो करीं विरोध इह एक राम अनेक दीर। । सथ व्याघात । | व्याघातं ज कष चौर ते' कौजे कारज शौर । बहरि विरोधी ते जह ल्यावै कारज टर ॥ प्रथम यथा| . नामप्रभाव लान सिव नोकै 1 ^“ काल कटः फल दौन मौके ॥ 1 ० सानसर्हद्य । दवितीय । पेसे बचन कटोर सुनि जोन द्य विलगन । तो पुनि विषम वियोग दुख सहि मासरं प्रान॥ रहम जीवन वताय सरन ट्‌ कीन्हा । चथ क्षारनभ्राला) कारन काज परंपरा कारनसाला देखि । यथघा्‌। धर्म तै विरति जोग तै ज्ञाना) ज्नानसोक्प्रद्‌ वेद्‌ वखाना ॥ दहा जोग कारन, ज्ञान कार्ज, ज्ञान कारन सोचं सारज । | । अथ एकावली गहत सुकते के रौति तें एक्रावलि पहिचानि। वथा । | विषय करन सुर जौव समेता ।.., सकल एक ते एक सचेता ॥ परध साल्ादीपक। रौप एकाबलि -भिके माला दीपक होत । सानसरुह्य । ८१ यधा) जग जप राम राम जपनेही। ~ प्रथ सार ल्त । एकं ठक ते अधिक बखानो। सार अलक्त सोद सानो ॥ * यधा] तिन सहँ हिज हिज सहं श्रुतिघारौ । तिन सरह नियम नौति अनुसार ॥ यथासंख्य । यथास्य वरनन विषे वसतु अनुक्रस संग । - यथा । बन्दौं राम नाम रघुवर को । ~" देतु छसान भानु हिसकर को ॥ । अध परजाय) । दे प्रजाय अनेका को त्रास सो आय एक। पिरि रम सो जब एक वह आश्रय धरे अनेक॥; #; प्रधम यथा| 4, दिखरावा माताहि सुखः अद्भुत रूपः अखण्ड । | ` रोम रोम प्रति राजं कोटि कोटि ब्रह्मण्ड ॥ ८ सानसषरहस्य ।. हितीय। सतौ विधाचौ इन्दिरा देखौ असित अनृप। जैहिजेहिमेषच्जादिसुर तेहितेहि सति अनुरूप । श्रध परिसंख्या लत्तण । परिसंख्या इका थल बरजि दूजे थल ठराय । यथा) द्‌श्ड जतिन कर मेद्‌ जदं त्वक ल्य समाज नौला सनसिज सुनिय अस रामचन्द्र मे राज॥ विकल्य । है विकल्य यह वौ वहे इहि विधि को हनत्तान्त। । यथा) , कौ तन प्रान कि कैवल प्राना । बिधि करतब कष्टं जातन जाना ॥ तिक्त । ` उपमानोपमेय मे सन्देह अर भृत वतमान से उपमान उपमेय रहित, भविष्य मे विक्षल्प यह सेद्‌ । अध खसुदखय। दाय समुच्चय भाव बह कडू* इका .उपजे संग । एक काज चारो करन चरौ अनेका डवा रंग ॥ सानसरदसछ। ८ प्रयत्न) “सक्च सोय" ते ^सुमिरि पिता पन सन अति छोभाः' लों। दितीय। ४ देखि रास पद्कामल तिहार! . ` अव पूजे सव काजद्मारे॥ | इह एक रामपद्‌ कमल ते अनेक काज भणए। । रधं कारकदटोपक लक्तणः; कारक दौपक एक मे क्रम सों भाव अनेक। । यथा| लेत चद़ावत खेचत गा । .... अध समाघध लतच्तण्‌ । सा समाध कारज सुगम चौर ईत्‌ मिलतिद्ोत। यथा <. सकल श्रमानुब करम तुम्हारे । ~." कवल कुलगृरु्लपा सुधारे ॥ `“ इहा कुलगुरुक्तपा पाय कारन भयो, श्रध प्रत्यनीक रूक्तण । प्र्नौक जे शव कौ पच देखि कर कोप) - | ८8 सनच्रहद्छ । यथा । । रे खल का सारसि कपि भाल्‌। में विज्ञाक तैर से काल्‌ ॥ इहै रम पत्त बानर वे काप रावन कन्हे | श्रय काव्यार्थापल्ति लक्षण । काव्वर्घापति यह किये तेहि क्षा यह कड जान्‌ । यथा] क ४० - 1 पिय तडि ठै जौतव संब्रासा । जासु दृत कर ठेसनं कासा ॥ , , इर जाकी दूत लंका जारी ताक तुस कहा । श्रध काव्यलिंग। काव्य लिंग जरह युक्ति सअं समर्थन ज्य । ५ यथा| . 8 नर कस टशकंध वालि वध्ये जैडिं एक सर। बीस लेचन चंच धिक तव जन्द्र क्रुजाति जड प्रथ अर्थ॑न्तरन्याख लच्ण । जा विशेष सामान्यं हट ती अर्थान्तरन्यास । यथा। रास एका तापस तिय तारी । ;“ ` सानसरस्य । ८५ | रामप्रसाद सच नरि सपने । इहह ली।.' विक्र सण ४ वेकस्र हाय विशेष जदं फिरि सासान्य विशेष । | यथा । | रघुवौर निज सुख जाभ्ु गुनगन कहत अम | जगनाथ सी । का न छह विनीत परम णु- | नौत सहन सिष्ु सो ॥ य प्रौदोक्नि लच्ण । परौटोकति उतकार्षं कँ डतु घरे ज़ अतु! यध) कास कलम्‌ कार भुजवल सौव । ~. अथ सखम्भ{वना लत्त्स । ज्चौयींलो यीं रोय ती सम्भावना विचार । यथा) | जो तुस्त मुनिकी नै 1, | | व ~= = ~ जो पदरज सिर धरत गोसंरई' ॥ श्रथ सिष्याध्यवसित चन्त । मिथ्याध्यवसित भाटदी करहेलुभटीरीतते) ८६ सानसर्दद्य । =-= ९ ५९ यधा । ~ कम पीट जासि वरू वारा । | : रबैष्यारुत वक्‌ काद्ध सास ॥ 4 प्रघ ललित चक्तण । ललित कष्टो कष्टं चाद्ये तादी को प्रतिर्विंब। यथा । । सुनिय सुधा देखिय गर्ल सव करतूत कराल । जं तहं काक उलृवा पिक सानस सद्छोत सराल॥ इहं रामराज असिक सुनन भाच देखिषें सों बनचखायोप्नोन कहे सुधा गरल काक उलूक सराल कहे प्रतिविस्व । । प्रडइपन लत्तणं 1 तीन प्रहणन जतन तरिनुौष्ित कल जह जां नारित तै अधिकता दूजो करत वखान ॥ सोधत जाक जतन को वस्तु चद कर सोय । प्रघम यधा। - सचत परय रलौ दिन रातौ । ६ अव प्रु देखि जुडानौ छाती ॥ | इहै नहितरःरह । | ननम 1 सानसरहय । ८9 दितीय यथा 1 1 पुनत वचन विसरे सव दूखा । ` ` ठषावन्त जिमि पाय पियुखा ॥ ठतोय यथा। ङ्ह विधि सन विचार कर राजा। साप गये कपि सहित समाजा ॥ रध विषाद । सी विषाद्‌ चितचोह ते उलटे ने कु हाय । यथा| «तात जाउ वसि बैग नदद? ते “सर | सम लभ लौः। प्रसूने आन उपमादिकं सवं विषाद्‌ कौं पैसन करदं ॥ ध उक्लास। गुन चरीयुन नव चीर को चीर धरै उल्लास । गुन ते.गुन यथा । जो हरबदहिं पर सस्ति देखी 1 ... , दोष ते दोष वथा। दुखित हंद पर धिपत्ति विषौ । । गुन पै दीष यथा । जरहिं सद्धा प्रर सम्पत्ति देखो श्छ 41 ३। सआानस्रुहस्य | | श्रध सेस स्तय 1 गुन मरे दोषरू दोषे गुन कल्यनासो लेस । यधा! जो नहि होत सोह अति सोष्टीं | . वित्ते तात कवन विधि तों | गुने दोष वधा । ` लोहि दौन सुख सुसु सुराज्‌ । ` `“ कीन्ह कोक सव कर कालू ॥ परध सुद्धा ल्त] सुद्धा प्रस्तुत पद्‌ विभेःयीरे अथं प्रस । यघा | सहसनास सुनि मलित सुनि तुलसौ बल्लभं नास । सकुचितहियर्हसिनिरषिसियधरसषुरन्धरसास ॥ इहां तुलसौदास क वज्लभ, अर छन्दा कै बल्ल | श्रध रत्नावली लन्तण । रत्ाबलि प्रस्तुत चरथ क्रम ते चीरे नाम । यधा] प्रद्रा नगन पद्‌ प्रीति ज्ञेहि जानो नगन समान । -.| जेगन ताहि जययुत रहत तुचसौ संसथ हान ॥ ` नगन भरत जगन अराम निकसो । ` सानस्रहस्य । ८्< रथ तहुन लचणं । तदन तलि गुन चखापनो सङ्गति को गुन सेखि। यघा) धृसह तजे सहज करुचाई । च्रगरप्रसङ्ग सुगन्ध बसाड ॥ अथ पूर्वरूप लच्चण । पूर्वरूप क्ते संग गुन तजि फिरि अपनो लेय । टूनोज्ो गुन ना सिट किये मिटन कौ मेय ॥ प्रथम यथा । , कार सुवैष जगवच्चका जो ! ““" वेषप्रताप पूजियत सोस ॥ उघरहिं अन्त न होहि निबाद्भं । कालनेमि जिमि रावन रद्र ॥ , दितीय यथा | कामचरित नारद्‌ सव भाषे! ~ जदि वरि प्रथम शिव रखे॥ ` अथ अतदुगुन लचण। लागत सङ्कत गुन नदीं कड यतहुन ताद । € ० सानक्लर्हस्य । भामा ^ यथा। ^... खलह करहि सल पाह सुसंगु । सिटहि न सिन सुभाव अमू ॥ श्रथ प्रनशुन.लच्तण । यनगुन सङ्गति ते जवै पुरब गुन सरसाथ । यथा । ..“ मज्जन फल टेखिय ततकाला | काक द्ंडि पिकं बह सराला॥ मोलित लच्ण । | सौलित नो सादृश्च ते मेद जवै न लखाय ! यथा) । तव सुर जिते एकं दसकन्धर । अरव बह भये तक गिरिकन्दर ॥ अध उामन्या खच्ख। सासान्य ज्ञु सादृश्च वे जाति परे न विरेष । यधा) ~ "` रास लखन सखि होहि कि नादी |, अथ खन्धील्ित लक्षण । उन्दीलित सादृश्च सै भेद फुरे तव सान 1 सानस्रहस्य । € यथा व्खन। । चेस्यक हरवा अङ मिलि चअरधिक सुदाय । ॥ जानि परे सिय दियर जव ह्ुभिलाय ॥ परध वि्नेष लचण । यहे विशेष विशेष पुनि फुरे जु सता भस । यधा) वेषन सो सखि तिय नहि संगा । , गे अनौ चलत चतुरंग ॥ अरघ गूदोत्तर। गृटोत्तर कद भाव ते उत्तर दौनो होय । यधा] छ जिन जल्यना कक सुजस नासते! ५ “'इता कर्त कतः न, “वागी लों ॥ ¦ श्रध प्रञ्रोत्तरलच्तण । चिच प्रश्च उत्तर टयो एक शब्द्‌ मे होय । , वधा) \. |. खल्य॒ निकट आई खल तोद, तैते उलटा हौहि लीः 1 श्रथ सचय लच्चण। सुम परास लखं करे क्रिया कष्टं भाय । क ५५, ९ ५३ ५ २ `, मानसरख। यधा वेद नास कहि अंगुरिन खण्ड चकास । सूपनखा प्रसु पङ लदिमिन पास ॥ रध पिद्धित लचण । पिहित छिपी पर बात को जान जनाव भाय। यधा) "सतौ कपट जाना सुर खासी? तें । ` “ (विपिन अक्षेलि लीं । अथ व्याजोक्ति। व्याज उक्ति कु चीर विधि कड दुरे आकार ।. यथा| „ नास प्रताप भानुच्रवनौसा । तासु सचिव मँ सुन सीसा ॥ अथ गृट्ोक्ति लक्तण । गृटोकति सिस चौर कै कौजे पर उपदेश, | यथा। ` : भसः रल धीर जाहि रथ चाक” ते । ` भ्जाक्षे चस र होय लँ । छपायो । सानस्षरहस्य । € अध विन्नोक्ति च्च्ण। सैष छष्यो परगट करे वित्रोक्ति ह न यधा] वेग विलस्व न करिव प साजिथ सवे समाज। ४ सुददिन सुमङ्गल तवहं जव राम होहि युवराज॥ |“ थ शुक्ति लच्ण। यड युत्ति कौन्दे क्रिया क्म छप्रायो जाथ । यधा) गये जासज्ञुग सुपति चाये! ` <| खर घर बाज अनंदट्‌ बधाये ॥ द तोड्डांजो रजाको निसामें निसाचर रानी की सै पर राश्योसो कसं कानन जाय पध लोकोक्ि लचण। लोकोकति कृष्टं बचन जो लीने लोकाप्रवाद्‌ । यथा 1 । देव कडा हम तुसहि गोस॑ई । "~ दधन पात किरातमिताई ॥ ` श्रधघद्ैवोक्ति। लोकोकति कषु भेद सौ सो छैकोकति प्रबौन। € सानसरहस्य | यथा । [ि सल्य सशहि कद्यो वर देना सानहु सानि कि जेहि चवैना ॥ द चेना लोकोक्ति अर राजन दद्दी ।. प्रथ वक्रोक्ति लच्तस । | लक्राउक्तिप्रेष सों अर्थं फिरै तव छोच । यघा। धर्मसीलता तब जग जागौ । ` पावा द्रसं हम बडभागी ॥ एवां अर्थं हस बडे भाग्यबान दूसरो दार याग ब्डो घटो, जेषे दिवा बदटायदस्वसो घ- टरिबे को खयं) द्म खभावोक्ि। स॒भावोत्ति जं जानिये बरनो जाय सभाय | यथा खस सभाव चकते गरु प्रादय । सियसनेह बरनत संनसादहीं । सथ भाविकं लकच्तेण। भाविक भूत भविष्य जो परत कहत बनाय ।. सातस्र्‌हस्य । € ५ (118. खोजत रद्य तोडि सुतघाती । : च्राज्तु निपाति ज्ुडावों छातौ ॥ प्रघ उदात) सो उदात जहं वरनिये सस्ति को अधिकार । यधा] जेहि तिरडइत तैहि ससय निदहारौ । तेहि लघु लाग भुवन दसचारौ ॥ प्र अत्युक्ति । चदूभुत टौ वरनिवे जदं अलयुक्ति प्रमान । धधा 0 स्वस दान रौन सव काट । जेहि पावा गखा नहि ताद ॥ अथ निरुक्ति) सो निरक्ति जद जुक्ति सो'चर्थकल्पनां चान्‌ । यधा) ध कानककलित अदिवेलि बनाड । ~ (> © लखि नहि परं सपनं सुहा ॥ दां नागवेलि को अदिनेलि क्च जैसे खाटकलोषचन्‌ । ९६ सानसरश्य । श्रथ प्रतिषेध लक्षण । सो प्रतिषेध निषि जो चरथं निषेधो जाय । यथ । कालनेय सस सैं नरी, सुनइ बचन इलुमान । अस कटहि। रथ विधि लचण। अलद्ार बिधि सिद्ध को यर्थ साधिये फेर । यधा) विप्रवभरन कर पोषन जोड ताकर्‌ नाघर मरत अस रोड ॥ परथ हेतु लक्तण । चेतु चलंक्षत दोष जहं कारन कारज सद्ग । त्ारन कार्जं ये सवे बस्तु एकह रङ्ग ॥ प्रघस । रघुक्कुलकमल सुजनसुखदाता । आये छ्ुसखल देव सुनित्राता ॥ हितोय। “जदह लगि जगत सनेंह सगाई । ` तै “मोरे सवे एक तुम खामी लीं ॥ इति भर्थालहयर । सानसरहस्य । ९७ प्रघ शब्दाश्र्तङ्भार- तद्य प्रथम रोति ल्त । चमल्ारचद्द्रिका में-दोष्धा। गौडी वैदर्सी कहत पुनि पञ्चाली जान । साटौ चोज प्रसाद पुनि माधुर्ज॑डि कौ खान ॥ यह चार्धं रौतसें चोज प्रसाद्‌ माधुव्धये तौन मुन उपनत हं । जेसे मरत क्षे सत मे ध्वनि काव्य चात्या तैसे वासन के मत से सैत चराह्मा। श्रथ गीदही ल्त । यदि संनोगी वणं जर होहि सु वड़ो समास । छल्दवन्ध रचना करै तद गीडी को बास ॥ याको परषाहत्ि कहत डं सो गीडीमें लिलत ई) अध ससास लच्तण। जोसोको करिल्ितेकोमेयो नौं होय यहे सु जाके चर्ध॑में लि समस डैसोय ॥ जोसोको करि इल्यादि पद में णब्दस्षमूष मे नादी रहे डे अर्ध-कहत सें जानी जाय है । पाना नाना ०म--००००४ ट्ट मानसरह्ख। जोसो थघा। पीत भौन भँगुली तन सोहहि 1 पीतज्ञो सिशुली सो तन मे सोद, को घधा। राम गये बन प्रान न जाहौं। एष्टा राम वन को गये। करि यथधा। न्न्तोग प्रेमबस 1" इहा प्रेम कर्‌ बस जागी | के यधा) ““रामहेतु ।” इदा राम कै हेतु । ते यथा। “रामसुसुख निकसे वचन 1? दहै राससुख ते निकसे बचन जानिये । दूत्यादि। अथ गौडी श्रोज शुन यधा। कटकंटाड कोटिन भट गजि । वैदर्भी लच्तण । कम समासं कि समास नहि अच्तर सानुखार। | नहि टवर्ग साधुं गुन वैदी उच्चार , ॥ [प नण 09 सानसर्‌इस्य । < यधा) इन किङ्धिनि नपुर वाज्हिं। प्रथ पञ्चालो लन्तण । गौडी वैदभीं सिने पद्धाली हेरौति , । उपजत तदा प्रसाद्‌ गुन सुकवि लखं करि प्रीति॥ यधा) सतानन्दपद्‌ बन्दि प्रभु इषं आसमिषपाय । चलद तात सुनि कहा तव प्रठबा जनक बुलाय॥ दहै नन्द वन्दि वैदी अर शमं पठवा गौडी याते पञ्चालो । श्रध लाटी। कोमल पद्‌ जदं रहत्‌ हे उपजत गुन परसाद्‌ । यघा। खश्चनं सञ्चुल तिरष्टे नयना * । निज पति क्यो तिन हिं सिव सयना । लाटी सें कोमलाहत्ति अन्तभूत हे ] कोड रौति को सन्दालक्कार चरन्तभूत मानत ह रौति की च्रत्ति हतं ई 122 ९.2. ` सानसरहसय । अथ श्रनुप्राख चण) खर चिनु समता बनं कौ अनुप्रास ह सोय । खर की समतादहोयवान होय यह आग्रह नहीं वरनन कौ समता चादौ, अश्र छकाऽनुप्रास लक्तण । जदह सवनं अनेक की इवावेर समता हाव । ताज्घा छेका कहत ह । [र खा । अस्भोजच्रस्वकचस्वडसगसृञ्रङ्पुलकावलिकड । | इदा एक वनं अक्रारवकारकौ एकवार ससतार॥ परध त्ति अनुप्रास लत्तण | चति एक बह बरन कौ बहू विरे ससता सान। यथा) चहत पुराननसेजिसो ्रानन देखो रूप । कटी सुजानन जगत में एक ईश्वरौ सूप ॥ इहा एक नकार बह बार आयो । परव क्ट लच््य | रथं सहित जदं पद्‌ फिर माब सेटः तहं होय । सो लाटानुप्रास है भाषत कवि सब कोय 1 मानसूरचस्य | ५९. यधा) सान प्रसि पपन प्रसिड सुश्रान प्रसि प्रसिड परायन 1 | मान प्रसिद चु दान प्रसि प्रसिड सदा सरदार उपायन ॥ सीन प्रसि सु डलं ्रसिद्र सु सत्य प्रसि प्रसि सुभायन। न्नान प्रसिद प्रवानं प्रसिष्ठ चु धाम प्रसि प्रसिद्ध नरायन ॥ ध जम लत्तण। जसक शब्द्‌ चोरी रै अथं जुदा न्तेजाय । यथा 1 सुजस सरस दिजराज ते किये पाल दिजराज। भूप ईप्वरौसिंह नित टाटत सिंह समाज ¢ उदाहरन भूषनन के लिखे सिते से खान । जे न सिक्ते ते धरि द्ये तुलसी भूवन जान॥ प्रद पार जल पान करि ओप सहित परिवार। तन लाग्यो रघुवर विरह राड गयो सुरधास ॥ सामरास कहि रास कहि स्रामं कहि सम) तन लाग्यो रघुषर बिरह राड मये सुरघास ॥ रथ पिङ्कल गेति। प्रथम गन नाम) । मगन नगन भनि भगन असू यगनसदा सुम जान। जगनरगनसुनुसगनपुनि तगनजुच्रसुभवशान ॥ १०२ मानसर । सचय) सगन तीन शुरु जानिये नगन तौन लघु होय । भगन आदिशुरं आदिलघ्ु यगन कडँ सव कोय ॥ जगन मध्य गुर जानिवे रगन मध्य लघु रोय । सगन चअन्तगुरु अन्तलघु तगन कहं सव कोय ॥ रय गनं देवता । ^ महौ देवता मगन को नाभ नभन को सेखि । जलजो जानो यगन को चन्द्‌ भगन को देखि ॥ सुरज जानो जगन को रगन अगिनि सहं सानि। कात समुक्छिये सगन कौ तगन अकासवखान ॥ अध गनं फस) भूमि सुव, नाग अनन्द, मङ्गल चन्द, जलजा बदिन, सूरज सु सखे, अग्नि अङ्ग दाद, काल देस उदास, चक्रास सुच्च। अध गन जाति। मगन नगन ये मिच है भगन यगनये ट्स । उदासीन नज त जानियेरस रिपु केसदास ॥ सानसरहस्य । १०२ "~~ रध्‌ माचा प्रस्तार। | देह प्रथम गुर कै तरे लघु पुनि सम करि पति! उनरे गुरु लघु दौजिधे संब लघु लों याभति।॥ मात्रा नष्ट । परब क्रम ते अङ्कं टे लिखि सब कला बनाय । सैष अङ्कः सें प्रगट पुनि पुष्टि अङ्‌ सिटाय ॥ उवरे अड कलु पुनि तरह ते नीचे कौ मत्त । पर मत्तालथ हिय शुस नष्ट कडे अनुरत्त ॥ । नष्ट उदि । अन्त अड सें गुर सिर कै अङ्गः घटाडइये जेसै एकङस.से तोन + जाट = ग्यारह गये दस रहे यह दसवां भेद्‌ । अध मात्रा मेष 1. है दै काटा सम लिखह एका अङ्क ता अरन्त । रादि एक इक कीच द गनत करहु अनन्त ॥ सौसञ्र॑वाता सीसके पर जुग अंक मिलाय । सूने कठं परिये मत्त मैरुहाीजाय ॥'| १०४ सानसर्हद्य.। ध साता पताका लच्तंण। जे लकीर पताका श्यावे खर्वश्च ताक्षा अलगावे। तादीसंख्याक्ीढाकरियेनामपताका्ौतौधरिये। पुशूब ल्लु अलसर अंक भिन् लिखि देखिये । अन्त रंक इक खंक कठ तेहि रेखिये ॥ तासे कसते इका इका अङ्कः घटाडये ` । बा टिम चध ते हिति प॑मति लिखि जाड्ये ॥ तिव पंगतिसेदहेहेओरि कसी क्रा । चीयि पँगति मे तीन तीन दचितमेंध्यो ॥ इन सतन प्रति प॑तत इक बट्‌ अङ्कः ज घटे पताका हप लिष्दी निस्संक ज ॥ मात्रा मकंटो लत्तण-दोहा 1 क्रमं उदटिष्ट शुन तीसरे पाद्ष्टौन भरचार । वह पट्‌ पञ्चम हान चौटदी भर निरधार ॥ | परध वरन प्रस्तार वरवा। गर परहिते तर लघु धरं सम कारि पीत । मुर ते पूरन लघु लों लिखियाभतं ` ॥ सचरदहदय ! १०४५ प्रव उर्णनष्ट- दोदडा। नष्ट वरनसें जाम करिससमभागनि लघु ्रान। विषम एक दै भाग करि पुनि तासै मुक ठान ॥ वातत¶्‌। सम वृ तौ लघु दौज विषस तौ गृरु इच्छा परजन्त गुस ते पूरन कौजे 1 नष्टरूप श्रध वरन द्िष्ट-टोडा। लिखि पृष्टे पर अंकतेदून दून लिखि ददर । लघु सिर ग्रङ्नि जारि ङक एक सिला कडि दद्‌ च्रथ वर्णन मेर छप्यै। प्रथम जुगल युनि तीन चार इसि क्षाठा कौजे । आदि चरत दुष योर एक इक यंक धरौजे ॥ सिखर अंक लुग जोरि बहुरि तर काटा ठदिए। पंगत पंगत जैरितामसुवतेसेदसुं कहिए ॥ तरत्रंतसकललहतासुउपवियएकगुरतीजेदिणुस। जर॑कजीनतरहँतेतिकगुरवरनसैलस्चनासुङुस ॥ रप वरन स का-पताका लच्तन। वरन पताका पडिलङी दै. उदिष्टं कम चर॑क। प्र च॑वन भरिये बहुरि ले पूरव कै अंक ॥ १०६ मानसरस्य परिक्तेरी जो पाद्ये तजिये तारी च्र॑क। करि गनती प्रस्तार कौ जानि लेह निरसंका॥ प्रय वनं सक॑टी , पट क्ैठा करि आदि क्रमसुगुन दृसक पीति। आदिहि का गुन दृसरे लिखिये चौथी पौति॥ चीथी की आधी पैंगति पचरई' छटई' हाय । पच चौधौ को मिला पाति तीसशै जाव ॥ वरन मर्कटो रूप-त्रथ छ्द्‌। | ौष्टन्द अदि सव छन्द लिखि गन्ध विस्तार । डत अरु रसायन सें प्रयाजन नहीं । यतं । दद्या क्षीरा चौपाई गौतका क लक्षन लिखि- | । यतु हे ॥ | -----~--*-------- --- दोषा । तेरह ते म्यारा जहां पुनि सी रत निबाहि। सेई पिंगल कै मते दिहा छन्द काहि ॥. | प्रर दादा उलट सरटा इत डे। | चोपाई लन । | सरह मत्ता छन्द गति रूप चौपई सखि । पन्द्रह सै सत्तानवे जाने सेद विेषि . ॥ मानसरटसख ¦ १०७ -~----~ ~ ~~ -----~---~ गोतिका लक्षन । अट्ादस सें गौतिका रादिकं कच्चो फनौस । पौच लाख चौदह सहस दैसे पर उनतीस ॥ , दोहा । फल अकाश ग्रह आतमा माघ शुक्त बुधवार । काभौपति कौ कपा तें किय पूरन विस्तार ॥ प्प । श्रीका क्षै नाधवीर वलवर्ड उजागर । ताकी वाट महोप मप सुखमा गुनसागर ॥ तासु पुच उदितम्ौप पुनि दौपनरायन । हे प्रसिद्च सव जगत एक ते एक सुभायन ॥ सरदार तासुस॒तद्ेश्वरौ भूपतिमनि जसचंदसे । विलसतविचिचकाशौपुरौ अन्न, तञ्रानंदकन्दसे॥ सोरटा। मानस किये रस्य, छपा कर तिनकौ तकत। सुमिरन राम च्रवस्, काव्य कला फी मिस भये॥ । दोदा। | सुख विलास सज्जन करे दुरजन जरै हसेस । यह विचारः सरदार कवि वौन्हों कू कलेस ॥ १०८ सानसर्सय । दति श्रौमहाराजाधियजकाश्रीराज णौमदी- प्रवसैप्रसाटनारयायणस्यािगासीकृष्णप्रियापुरबा- सीहरिजमकवीपवरात्मजेन सरद्ाराख्यकवौ्वरे ` णविरचिते मानसर साहिल्संपृंस्‌ + टोष्टा) = ~ "= उनसर सौ एकड्स वुधै दादसि सित वैसाख । कपौ नकल से लिखि चुव्छीं महादेव हरि माष ॥ ॥ इति ॥ "न~ [त